विटामिन-सी, एंथोसायनिन, जिंक और आयरन से समृद्ध है आलू की नई किस्म; अनुकूल परिस्थितियों में प्रति हेक्टेयर 32 से 35 टन तक उत्पादन
नई दिल्ली,(आरएनएस)। देश में पोषण सुरक्षा को मजबूत बनाने और आवश्यक विटामिन एवं खनिजों की कमी से उत्पन्न होने वाली ‘छिपी भूख’ की समस्या से निपटने के लिए भारतीय कृषि वैज्ञानिकों ने पोषक तत्वों से भरपूर आलू की रंगीन किस्में विकसित की हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान (आईसीएआर-सीपीआरआई) द्वारा विकसित इन किस्मों में कुफरी नीलकंठ, कुफरी माणिक और कुफरी जामुनिया प्रमुख हैं। इनमें कुफरी जामुनिया अपने आकर्षक बैंगनी गूदे और बेहतर पोषण गुणों के कारण विशेष महत्व रखती है।
कुफरी जामुनिया में विटामिन-सी, एंथोसायनिन, कैरोटीनॉयड, जिंक और आयरन जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं। यह किस्म न केवल आहार की पोषण गुणवत्ता बढ़ाने की क्षमता रखती है, बल्कि अपने विशिष्ट रंग, स्वाद और विभिन्न व्यंजनों में उपयोग की संभावनाओं के कारण उपभोक्ताओं के बीच भी आकर्षण का केंद्र बन सकती है। इसके अच्छे कृषि प्रदर्शन और भंडारण क्षमता से किसानों को भी लाभ मिलने की संभावना है।
पर्याप्त भोजन के बावजूद बनी रहती है पोषक तत्वों की कमी
कई लोगों को पर्याप्त मात्रा में कैलोरी मिलने के बावजूद उनके भोजन में जरूरी विटामिन और खनिजों की कमी रह जाती है। पोषण की इस स्थिति को ‘छिपी भूख’ कहा जाता है। इससे निपटने के लिए वैज्ञानिक ऐसी फसलें विकसित कर रहे हैं, जिनमें प्राकृतिक रूप से पोषक तत्वों की मात्रा अधिक हो।
इस दिशा में जैव-संवर्धन एक महत्वपूर्ण तकनीक है। इसके अंतर्गत पौध प्रजनन और चयन की वैज्ञानिक विधियों से फसलों की पोषण गुणवत्ता में सुधार किया जाता है। खाद्य पदार्थों के प्रसंस्करण के दौरान उनमें अतिरिक्त पोषक तत्व मिलाने की पारंपरिक प्रक्रिया से यह अलग है, क्योंकि जैव-संवर्धित फसलों में पोषक तत्व फसल के विकास के दौरान ही समाहित होते हैं।
रंगीन आलू की किस्में इसी प्रयास का परिणाम हैं। इनके लाल, बैंगनी और नीले गूदे में प्राकृतिक रंगद्रव्य, विशेष रूप से एंथोसायनिन और कैरोटीनॉयड पाए जाते हैं। ये यौगिक एंटीऑक्सीडेंट गुणों से जुड़े हैं। इनके अलावा, कुछ किस्मों में आयरन और जिंक जैसे सूक्ष्म पोषक तत्व भी अधिक मात्रा में मौजूद होते हैं। इस प्रकार, रोजमर्रा के भोजन में शामिल आलू के माध्यम से आहार की पोषण गुणवत्ता बेहतर बनाने की संभावना बढ़ती है।
तीन प्रमुख रंगीन किस्में विकसित
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान ने पोषक तत्वों से भरपूर आलू की तीन प्रमुख किस्में विकसित की हैं।
कुफरी नीलकंठ: वर्ष 2018 में जारी की गई यह संस्थान की शुरुआती विशिष्ट बैंगनी छिलके वाली आलू किस्मों में शामिल है। इसकी खेती पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ सहित कई राज्यों में की जा सकती है। इसमें एंटीऑक्सीडेंट गुण पाए जाते हैं।
कुफरी माणिक: वर्ष 2021 में जारी इस किस्म के कंद गहरे लाल रंग के, गोल आकार के और मध्यम गहराई वाली आंखों वाले होते हैं। इसका गूदा पीला होता है। इसमें एंथोसायनिन, जिंक और आयरन जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं।
कुफरी जामुनिया: वर्ष 2024 में जारी इस किस्म की खासियत इसका गहरा बैंगनी छिलका और बैंगनी गूदा है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, इसमें कुफरी नीलकंठ और कुफरी माणिक की तुलना में विटामिन-सी, एंथोसायनिन और कैरोटीनॉयड का स्तर अधिक है। इसमें जिंक और आयरन भी पाए जाते हैं। अपने विशिष्ट रंग और पोषण गुणों के कारण यह घरेलू भोजन तथा खाद्य प्रसंस्करण उद्योग, दोनों के लिए उपयोगी हो सकती है।
प्रति हेक्टेयर 32 से 35 टन तक उत्पादन की क्षमता
कुफरी जामुनिया मध्यम अवधि में पकने वाली आलू की किस्म है। इसके पौधे मध्यम ऊंचाई के होते हैं और उनका ऊपरी फैलाव अर्ध-सघन होता है। इसके कंद आयताकार, गहरे बैंगनी छिलके और बैंगनी गूदे वाले होते हैं। कंदों की आंखें उथली होती हैं और उनकी बनावट भुरभुरी होती है। प्रत्येक पौधे से सामान्यत: 10 से 12 मध्यम से बड़े आकार के कंद प्राप्त हो सकते हैं।
संस्थान की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, अनुशंसित कृषि पद्धतियों के तहत इस किस्म से प्रति हेक्टेयर 32 से 35 टन तक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। 90 दिनों की अवधि वाले कुछ स्थान-आधारित परीक्षणों में लगभग 49 टन प्रति हेक्टेयर उपज दर्ज की गई। इन परीक्षणों में कुल उत्पादन का करीब 90 प्रतिशत हिस्सा बाजार में बिक्री योग्य था।
इस किस्म की एक अन्य विशेषता इसकी भंडारण क्षमता है। इसमें कंदों की मध्यम सुप्तावस्था लगभग छह से आठ सप्ताह की होती है, जिससे अनुकूल परिस्थितियों में अंकुरण अपेक्षाकृत देर से होता है। इसके अलावा, इसमें सडऩ कम होने और भंडारण के दौरान वजन में सीमित कमी की विशेषताएं बताई गई हैं। ये गुण किसानों के लिए फसल के रखरखाव और विपणन की दृष्टि से उपयोगी हो सकते हैं।
विटामिन-सी और एंथोसायनिन की उल्लेखनीय मात्रा
कुफरी जामुनिया का पोषण मूल्य इसकी प्रमुख विशेषताओं में शामिल है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, इसके गूदे में प्रति 100 ग्राम लगभग 42.75 मिलीग्राम विटामिन-सी पाया जाता है। इसमें एंथोसायनिन की मात्रा गूदे में 42.05 मिलीग्राम और छिलके में 80.66 मिलीग्राम प्रति 100 ग्राम बताई गई है। इसके गूदे में कैरोटीनॉयड की मात्रा लगभग 161 माइक्रोग्राम प्रति 100 ग्राम ताजा वजन है।
इसके अलावा, गूदे में जिंक लगभग 22.77 भाग प्रति दस लाख (पीपीएम) और आयरन लगभग 32.23 पीपीएम पाया जाता है।
सामान्य आलू की तुलना में कुफरी जामुनिया में कुछ प्रमुख पोषक तत्वों की मात्रा अधिक बताई गई है। उपलब्ध तुलनात्मक आंकड़े इस प्रकार हैं:
पोषक तत्व (प्रति 100 ग्राम) कुफरी जामुनिया सामान्य आलू
विटामिन-सी 42.75 मिलीग्राम 23.15 मिलीग्राम
जिंक 2.28 मिलीग्राम 0.28 मिलीग्राम
आयरन 3.22 मिलीग्राम 0.57 मिलीग्राम
ये आंकड़े इस किस्म की पोषण संबंधी संभावनाओं को दर्शाते हैं। हालांकि, वास्तविक पोषक तत्वों की मात्रा कंदों की स्थिति, खेती की परिस्थितियों, भंडारण और पकाने की विधि के अनुसार बदल सकती है।
सब्जी से लेकर बेकरी उत्पादों तक उपयोग
कुफरी जामुनिया का उपयोग विभिन्न पारंपरिक व्यंजनों और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों में किया जा सकता है। इसका बैंगनी रंग व्यंजनों को अलग पहचान देता है, जबकि इसकी भुरभुरी बनावट इसे कई प्रकार के पकवानों के लिए उपयुक्त बनाती है।
इस किस्म के आलू से सब्जी, पराठा, पूरी और रायता तैयार किए जा सकते हैं। इसके अलावा, दलिया, हलवा, उपमा, डोसा और इडली के घोल में भी इसका इस्तेमाल किया जा सकता है। खाद्य प्रसंस्करण के क्षेत्र में इसके आटे का उपयोग बेकरी उत्पादों, सूप और कुकीज बनाने में किया जा सकता है।
बैंगनी आलू को निर्जलीकरण के माध्यम से विभिन्न उत्पादों में भी बदला जा सकता है। इससे एंथोसायनिन युक्त दलिया, सूजी और आटे जैसे उत्पाद तैयार करने की संभावनाएं हैं। ऐसे उत्पाद घरेलू उपभोग के साथ-साथ खाद्य उद्योग के लिए भी उपयोगी हो सकते हैं। हालांकि, प्रसंस्करण और पकाने के दौरान पोषक तत्वों की मात्रा में बदलाव हो सकता है।
उत्तर भारतीय मैदानी क्षेत्रों में खेती की संभावना
किसी भी नई फसल किस्म को बड़े स्तर पर अपनाने के लिए अलग-अलग कृषि-जलवायु परिस्थितियों में उसका स्थिर प्रदर्शन महत्वपूर्ण होता है। कुफरी जामुनिया ने विभिन्न स्थानों पर किए गए परीक्षणों में अच्छा प्रदर्शन किया है और इसे उत्तर भारतीय मैदानी क्षेत्रों में खेती के लिए अनुशंसित किया गया है।
आलू उत्पादक क्षेत्रों में इसकी खेती की संभावनाएं इसके उत्पादन, पोषण गुणवत्ता और उपभोक्ताओं के आकर्षण पर निर्भर करेंगी। इसके व्यापक प्रसार के लिए किसानों को उपयुक्त बीज, कृषि संबंधी मार्गदर्शन, भंडारण सुविधाओं और बाजार तक पहुंच उपलब्ध कराना भी महत्वपूर्ण होगा।
पोषण सुरक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण कदम
कुफरी जामुनिया बेहतर पोषण गुणवत्ता और कृषि संबंधी उपयोगिता को एक साथ जोडऩे वाली आलू की किस्म है। इसमें मौजूद विटामिन, एंटीऑक्सीडेंट और सूक्ष्म पोषक तत्व आहार में विविधता लाने के प्रयासों को समर्थन दे सकते हैं। इसके साथ ही, अच्छी उपज और भंडारण संबंधी विशेषताएं इसे किसानों के लिए संभावनाशील बनाती हैं।
आलू देश के आम भोजन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसे में उसकी पोषण गुणवत्ता में सुधार करने वाली किस्में व्यापक आबादी तक अतिरिक्त पोषक तत्व पहुंचाने का माध्यम बन सकती हैं। कुफरी जामुनिया का प्रसार, उचित कृषि प्रबंधन और इसके पोषण गुणों के प्रति जागरूकता बढ़ाना पोषण सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में उपयोगी कदम साबित हो सकता है।








