कैंसर से पत्नी की जंग ने बदली जिंदगी की दिशा, अब मरीजों और उनके परिजनों की मदद में जुटे दीपक मानकर

भोपाल, संदीप पंड़ा।
समाज में कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो अपने लिए नहीं बल्कि दूसरों के लिए जीने का संकल्प लेकर निकलते हैं। उनके कार्य धीरे-धीरे उनकी पहचान बन जाते हैं और सेवा उनके जीवन का उद्देश्य बन जाती है। भोपाल के दीपक मानकर भी आज ऐसे ही व्यक्तित्व के रूप में पहचान बना रहे हैं, जिनकी सेवा भावना कई जरूरतमंदों के लिए उम्मीद की किरण बन रही है।
दीपक मानकर का जन्म 28 अप्रैल 1970 को भोपाल में हुआ। उनके पिता एच.डब्ल्यू. मानकर भेल से सेवानिवृत्त कर्मचारी हैं। पिता के संस्कारों और आदर्शों में पले-बढ़े दीपक मानकर ने प्रारंभिक शिक्षा विक्रांत हायर सेकेंडरी स्कूल से प्राप्त की, जबकि स्नातक की शिक्षा भेल शासकीय कॉलेज से पूरी की। उनका परिवार पत्नी अंजू मानकर और दो पुत्रों शुभ्रांत मानकर एवं प्रतीक मानकर से मिलकर बना है।
एक बीमारी ने बदल दी जिंदगी की सोच
दीपक मानकर के जीवन में एक ऐसा दौर आया, जिसने उनकी सोच और जीवन की दिशा ही बदल दी। उनकी पत्नी अंजू मानकर को कैंसर जैसी गंभीर बीमारी ने घेर लिया। अचानक सामने आई इस बीमारी ने परिवार को गहरे संकट में डाल दिया। इलाज के दौरान उन्होंने और उनके परिवार ने कठिन परिस्थितियों का सामना किया।
अंजू मानकर का उपचार शासकीय जवाहरलाल नेहरू कैंसर अस्पताल, भोपाल में चला। परिवार की दृढ़ इच्छाशक्ति और उपचार के चलते उन्होंने कैंसर की जंग जीत ली। लेकिन अस्पताल में बिताए उस कठिन दौर ने दीपक मानकर को समाज की एक ऐसी तस्वीर दिखाई, जिसे वह चाहकर भी नजरअंदाज नहीं कर सके।
अस्पताल में देखा दूसरों का दर्द
इलाज के दौरान दीपक मानकर ने देखा कि अस्पताल में कैंसर मरीजों के साथ दूर-दराज से आए अनेक परिजन भी कठिन परिस्थितियों में अपना समय गुजार रहे हैं। किसी के पास रहने-खाने जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव था, तो किसी के पास इतना ही पैसा था कि वह किसी तरह अपने मरीज का इलाज करा सके।
मरीज के साथ आए परिजनों की परेशानी को उन्होंने बेहद करीब से महसूस किया। पत्नी के स्वस्थ होने के बाद जब अस्पताल से घर लौटने का समय आया, तभी उनके मन में एक विचार जन्मा—जिस दर्द को मैंने करीब से देखा है, उससे जूझ रहे दूसरे परिवारों की मदद के लिए भी मुझे कुछ करना चाहिए। यही विचार आगे चलकर उनके जीवन के एक नए अध्याय की शुरुआत बना।
‘कैंसर सेवा ग्रुप’ से शुरू हुई सेवा की मुहिम
घर लौटने के बाद दीपक मानकर ने इस विषय पर गंभीरता से विचार किया और कुछ ही समय बाद व्हाट्सऐप पर ‘कैंसर सेवा ग्रुप’ बनाया। इस ग्रुप में ऐसे लोगों को जोड़ा गया, जिनके मन में जरूरतमंदों की सहायता करने और समाज के लिए कुछ करने की इच्छा थी। धीरे-धीरे लोग इस मुहिम से जुड़ते चले गए और आज भी यह कारवां लगातार आगे बढ़ रहा है। प्रत्येक सप्ताह सहयोग राशि एकत्र की जाती है और उससे अल्पाहार जैसी आवश्यक सामग्री खरीदी जाती है। इसके बाद यह सामग्री जवाहरलाल नेहरू कैंसर अस्पताल में कैंसर मरीजों के साथ आए जरूरतमंद परिजनों को वितरित की जाती है। यह पहल उन परिवारों के लिए छोटी जरूर है, लेकिन उनके कठिन समय में बड़ी राहत का माध्यम बन रही है।
जरूरत पडऩे पर रक्त और प्लेटलेट्स के लिए भी आगे
दीपक मानकर की सेवा केवल भोजन और अल्पाहार वितरण तक सीमित नहीं है। रक्त अथवा प्लेटलेट्स की आवश्यकता होने पर भी वे जरूरतमंदों की सहायता के लिए आगे आने का प्रयास करते हैं। उनकी कोशिश रहती है कि आवश्यकता के समय मरीज और उनके परिजनों को अकेला महसूस न हो। उनका मानना है कि सेवा केवल आर्थिक मदद का नाम नहीं है। किसी जरूरतमंद के कठिन समय में उसके साथ खड़ा होना, उसकी जरूरत को समझना और यथासंभव सहायता करना भी सेवा का ही एक रूप है।
गांधी जयंती पर रक्तदान के लिए नई पहल
सेवा की इसी भावना को आगे बढ़ाते हुए दीपक मानकर ने 2 अक्टूबर, गांधी जयंती के अवसर पर एक और पहल की है। इस दिन उनकी अहिंसा विहार कॉलोनी में ब्लड कलेक्शन वैन बुलाने की योजना है। इसके माध्यम से कॉलोनीवासियों सहित अन्य लोगों को रक्तदान के लिए प्रेरित किया जाएगा। उनका उद्देश्य अधिक से अधिक लोगों को रक्तदान के लिए जागरूक करना और जरूरत के समय किसी मरीज को रक्त की कमी के कारण परेशानी न होने देना है।
अपना दर्द बना लिया दूसरों की ताकत
दीपक मानकर की कहानी केवल एक व्यक्ति की सेवा यात्रा नहीं है, बल्कि यह इस बात की मिसाल भी है कि जीवन में आई कठिन परिस्थिति को किस तरह समाजसेवा की प्रेरणा बनाया जा सकता है। पत्नी की बीमारी के दौरान जिस अस्पताल में उन्होंने मरीजों और उनके परिजनों की परेशानियों को देखा, उसी अस्पताल में आज वे जरूरतमंदों की मदद के लिए खड़े दिखाई देते हैं। उन्होंने अपने व्यक्तिगत अनुभव को केवल अपने तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे समाज के लिए सेवा का माध्यम बना दिया। ऐसे व्यक्तित्व समाज को यह संदेश देते हैं कि सेवा के लिए हमेशा बड़ी संपत्ति की नहीं, बल्कि बड़े मन और संवेदनशील सोच की जरूरत होती है। दीपक मानकर और उनके साथ जुड़े सभी सहयोगियों की यह सेवा यात्रा इसी तरह आगे बढ़ती रहे और जरूरतमंदों तक मदद का यह सिलसिला निरंतर पहुंचता रहे—इसी भावना के साथ उन्हें साधुवाद।








