रासुका दमनकारी कदम

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हाई कोर्ट ने कहा कि अधिकारियों का तानाशाही भरा और असंवैधानिक रवैया ऑरवेलियन डिस्टोपिया की धारणा को साकार कर सकता है। कहा जा सकता है कि फिलहाल इससे अधिक सटीक चेतावनी और कोई नहीं हो सकती। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दो-टूक फैसला दिया है कि सामाजिक कार्यकर्ता आकृति चौधरी पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) लगाना दमनकारी कदम था। नोएडा प्रशासन को मालूम था कि चौधरी की गिरफ्तारी कानूनन कमजोर बुनियाद पर टिकी है, इसलिए उन्हें आसानी से जमानत मिल जाएगी। ऐसा ना हो, इसलिए बिना किसी साक्ष्य के रासुका लगा दिया गया। अब जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की खंडपीठ ने ना सिर्फ रासुका को रद्द किया है, बल्कि अनुचित ढंग से इसे लगाने के लिए नोएडा की जिलाधिकारी मेधा रूपम की व्यक्तिगत जवाबदेही भी तय की है। हाई कोर्ट ने चौधरी के संवैधानिक अधिकारों के हनन के एवज में पांच लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है। यह रकम रूपम की तनख्वाह से काटी जाएगी। इस तरह कोर्ट ने ऐसा फैसला दिया है, जिससे गढ़ी हुई कहानी के आधार पर नागरिकों की निजी स्वतंत्रता के हनन की बढ़ती प्रवृत्ति पर रोक लग सकती है। दिल्ली विश्वविद्यालय की पूर्व रिसर्चर आकृति को नोएडा में मजदूर आंदोलन के दौरान गिरफ्तार किया गया। उन्होंने आम लोगों से मजदूरों के पक्ष में खड़ा होने का आह्वान किया था। पुलिस ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा माना। हाई कोर्ट ने कहा है कि शांतिपूर्व प्रतिरोध नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है, जिससे उन्हें निराधार आशंका के कारण वंचित नहीं किया जा सकता। अत: अदालत ने निर्देश दिया है कि इस मामले में दोषी अधिकारियों की सर्विस बुक में कोर्ट की नाराजगी दर्ज की जाए। इसके अलावा न्यायाधीशों ने नौकरशाहों और पुलिस अफसरों को यह याद दिलाकर उचित चेतावनी दी है कि उनकी वफादारी भारत के संविधान के प्रति है, ना कि सत्ताधारियों की सियासत प्रति। जिस दौर में सत्ता पक्ष के सियासी हितों और प्रशासनिक अधिकारियों के व्यवहार के बीच का फासला मिटता-सा चला गया है, न्यायपालिका की ऐसी टिप्पणी को एक सामयिक एवं प्रासंगिक हस्तक्षेप माना जाएगा। कोर्ट ने कहा कि इस तरह का तानाशाही भरा और असंवैधानिक रवैया ऑरवेलियन डिस्टोपिया (दमनकारी, भययुक्त राज्य) की धारणा को साकार कर सकता है। कहा जा सकता है कि मौजूदा दौर में इससे अधिक सटीक चेतावनी और कोई नहीं हो सकती।
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