अहमदाबाद ,21 सितंबर ,(आरएनएस)। देश के प्रमुख चाय ब्रांड ‘वाघ बकरी टी ग्रुप’ के चेयरमैन और जाने-माने उद्योगपति पीयूषभाई देसाई का 86 वर्ष की आयु में निधन हो गया है। कंपनी ने एक आधिकारिक बयान जारी कर उनके देहावसान की पुष्टि की। व्यापार को गांधीवादी मूल्यों, परोपकार और सामाजिक उत्तरदायित्व के साथ जोडक़र चलाने वाले पीयूषभाई छह दशकों से अधिक समय तक चाय उद्योग से जुड़े रहे। उन्होंने वाघ बकरी चाय को गुजरात की सीमाओं से बाहर निकालकर देश के कोने-कोने तक एक मजबूत राष्ट्रीय पहचान दिलाई।
छह दशकों का सफर और बेहतरीन टी-टेस्टर के रूप में पहचान
ग्रुप द्वारा जारी शोक संदेश के अनुसार, पीयूष देसाई को चाय के गहन ज्ञान, बेजोड़ गुणवत्ता और दीर्घकालिक कारोबारी रिश्तों के लिए जाना जाता था। वह एक सफल उद्योगपति होने के साथ-साथ खुद एक शीर्ष श्रेणी के ‘टी-टेस्टर’ (चाय के पारखी) थे। गुजरात विद्यापीठ के पूर्व कुलपति सुदर्शन अयंगर ने उन्हें याद करते हुए कहा कि पीयूषभाई एक ऐसे ‘सेल्फ-मेड’ उद्यमी थे, जिन्होंने महात्मा गांधी के सिद्धांतों को अपने व्यवसाय और निजी जीवन में पूरी तरह उतारा।
क्यों पड़ा था ब्रांड का नाम ‘वाघ बकरी’?
पीयूष देसाई अक्सर अपने ब्रांड के अनूठे नाम ‘वाघ बकरी’ के पीछे का दार्शनिक संदेश साझा किया करते थे। उनका मानना था कि जिस घाट पर बाघ और बकरी एक साथ बिना किसी डर के पानी पी सकें, वह एक आदर्श और अहिंसक समाज का प्रतीक है। ब्रांड का यह नाम सिर्फ व्यापारिक पहचान नहीं था, बल्कि इसके जरिए वह महात्मा गांधी के अहिंसा और सौहार्द के संदेश को घर-घर तक पहुंचा रहे थे। उनके परिवार का गांधीजी से नाता तब जुड़ा था, जब उनके दादाजी की मुलाकात दक्षिण अफ्रीका में महात्मा गांधी से हुई थी। इसी पारिवारिक जुड़ाव के कारण गांधीवादी ‘ट्रस्टीशिप’ का सिद्धांत और सादगीपूर्ण जीवन उनके प्रमुख मूल्य रहे।
अनुवाद फाउंडेशन और गांधी साहित्य के प्रसार में अहम योगदान
पीयूषभाई का जुड़ाव गुजरात विद्यापीठ और गांधीवादी विचारधारा से जुड़े विभिन्न सामाजिक अभियानों से गहराई से रहा। वह ‘अनुवाद फाउंडेशन’ के संस्थापक निदेशकों में शामिल थे, जिसकी स्थापना गुजरात विद्यापीठ के तत्कालीन कुलाधिपति नारायण देसाई के साथ मिलकर की गई थी। इस फाउंडेशन का मुख्य उद्देश्य गांधीजी के अप्रकाशित कार्यों और महादेवभाई देसाई की डायरियों का अनुवाद करना था। साथ ही, विभिन्न भारतीय भाषाओं के उत्कृष्ट साहित्य का बिना अंग्रेजी या हिंदी की मध्यस्थता के सीधे अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद कर ज्ञान को समृद्ध बनाना था। उनके निधन से चाय उद्योग और गांधीवादी विचार जगत में शोक की लहर दौड़ गई है।








