प्रदर्शन में शामिल होने पर छात्र को नोटिस, सुप्रीम कोर्ट बोला-मजिस्ट्रेट की हिम्मत कैसे हुई?

Join Us

नई दिल्ली(आरएनएस)। जंतर-मंतर पर छात्रों के विरोध प्रदर्शन में शामिल होने के बाद ग्रेटर नोएडा के कार्यपालक मजिस्ट्रेट द्वारा एक छात्र को नोटिस जारी किए जाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई है। शीर्ष अदालत ने सवाल किया कि जब अदालत पहले ही छात्रों के खिलाफ दर्ज सभी प्राथमिकी रद्द कर चुकी है और भविष्य में किसी भी छात्र के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगा चुकी है, तो कार्यपालक मजिस्ट्रेट ने नोटिस कैसे जारी कर दिया। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि अदालत के स्पष्ट आदेश के बावजूद किसी छात्र के खिलाफ कार्रवाई के लिए नोटिस जारी करना गंभीर बात है। उन्होंने कहा कि 1 सितंबर के आदेश में साफ तौर पर कहा गया था कि विरोध प्रदर्शन में शामिल युवाओं के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जा सकती।मामला गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के द्वितीय वर्ष के छात्र अक्षत त्रिपाठी से जुड़ा है। अक्षत जंतर-मंतर पर आयोजित कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन में शामिल हुए थे। इसके बाद 4 सितंबर को उन्हें कार्यपालक मजिस्ट्रेट की ओर से नोटिस जारी किया गया।नोटिस में आरोप लगाया गया था कि अक्षत ने सरकार के खिलाफ छात्रों को भडक़ाने और शांति व्यवस्था भंग करने का प्रयास किया। उनसे 5 लाख रुपये का मुचलका भरने के लिए भी कहा गया था।हालांकि, मामला सामने आने और विवाद बढऩे के बाद संबंधित नोटिस वापस ले लिया गया।नोटिस मिलने के बाद अक्षत त्रिपाठी ने सामाजिक माध्यम पर एक वीडियो जारी कर अपनी सफाई दी थी। उसने कहा था कि वह शांतिपूर्ण तरीके से विरोध प्रदर्शन में शामिल हुआ था और किसी तरह की हिंसा या कानून-व्यवस्था बिगाडऩे वाली गतिविधि में शामिल नहीं हुआ।अक्षत ने यह भी बताया था कि जिस समय वह प्रदर्शन में शामिल हुआ, उस दौरान वह विश्वविद्यालय की कक्षाओं में नहीं जा रहा था, क्योंकि विश्वविद्यालय करीब तीन महीने से बंद था।उसके अनुसार, वह तीन महीने के सेमेस्टर अवकाश के लिए 25 मई को विश्वविद्यालय परिसर से निकला था और इस दौरान प्रयागराज में रह रहा था।सुप्रीम कोर्ट ने 1 सितंबर को संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत मिली अपनी असाधारण शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए विरोध प्रदर्शनों से संबंधित आपराधिक कार्यवाहियों को समाप्त कर दिया था। यह आदेश मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने पारित किया था।अदालत ने अपने आदेश में कहा था कि विरोध प्रदर्शनों के संबंध में 20 से 25 जुलाई के बीच विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में दर्ज प्राथमिकी के आधार पर आगे कोई कार्रवाई या जांच नहीं की जाएगी। इन मामलों को सभी उद्देश्यों के लिए बंद माना जाएगा।
इसी आदेश के बावजूद छात्र को नोटिस जारी किए जाने पर सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जताई।

अदालत ने पूछा कि जब शीर्ष अदालत ने स्पष्ट रूप से छात्रों के खिलाफ किसी भी तरह की कार्रवाई पर रोक लगा दी थी, तब कार्यपालक मजिस्ट्रेट ने किस आधार पर नोटिस जारी किया।
शीर्ष अदालत की इस टिप्पणी के बाद संबंधित अधिकारियों की कार्रवाई पर सवाल खड़े हो गए हैं। मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने अपने पूर्व आदेश के पालन को लेकर सख्त रुख अपनाया और स्पष्ट किया कि न्यायालय के निर्देशों की अवहेलना स्वीकार नहीं की जा सकती।
००

Previous articleपंजाबी गायक एमी विर्क पर कनाडा में हमला, हमलावरों ने कार पर चलाई 7 गोलियां, बाल-बाल बचे
Next article2030 तक एआई इंसानों को मार देगा’, रिसर्चर की चेतावनी के बाद दुनिया में खलबली