अपने यहां चर्चाओं के अभिजात्यवादी स्वरूप का ही उदाहरण है कि ई-20 का चलन बढऩे पर खाद्य सुरक्षा एवं जल उपलब्धता को लेकर आने वाली चुनौतियों की ओर किसी पक्ष ने पर्याप्त ध्यान नहीं दिया है। वी. अनंत नागेश्वरन ने पेट्रोल में इथॉनोल की मिलावट पर चल रही बहस में साहसी हस्तक्षेप किया है। उन्होंने सरकार की ओर से पेश दलीलों से अलग विवेकपूर्ण राय सामने रखी है। उचित होगा कि केंद्र अपने मुख्य आर्थिक सलाहकार की बातों पर ध्यान दे और उनके परामर्श के मुताबिक आचरण करे। ई-20 ईंधन पर जारी विवाद में अब तक चर्चा इससे वाहनों को संभावित नुकसान पर केंद्रित रही है। जबकि नागेश्वरन ने इससे संबंधित एक अधिक दूरगामी महत्त्व के पहलू की चर्चा कर बहस को अधिक व्यापक आयाम दिया है। यह हमारे समाज में चर्चाओं के अभिजात्यवादी स्वरूप का ही परिणाम है कि ई-20 का चलन बढऩे पर उससे खाद्य सुरक्षा एवं जल उपलब्धता को लेकर आने वाली चुनौतियों पर किसी पक्ष ने पर्याप्त ध्यान नहीं दिया है।नागेश्वरन की तारीफ करनी होगी कि उन्होंने इस मुद्दे पर भी रोशनी डाली है। आर्थिक मामलों के मंत्रालय में कंसल्टैंट आकाश पुजारी के साथ एक अखबार में लिखे लेख में नागेश्वरन ने ध्यान दिलाया कि इथेनॉल उत्पादन के लिए गन्ना और अनाज- खासकर मक्के का उपयोग होता है। इसकी मांग बढऩे पर किसान अधिक जमीन पर इन फसलों की खेती के लिए प्रेरित हो सकते हैं। इससे खाद्य सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा एक लीटर इथेनॉल बनाने के लिए हजारों लीटर पानी की जरूरत पड़ती है।जिस समय भू-जल के नीचे जाने की समस्या से कई राज्य जूझ रहे हैं, इथेनॉल का उपयोग बढ़ाने का मतलब जल संसाधनों पर दबाव बढ़ाना होगा। भारत अगर ई-27 या ई-30 जैसे उच्च मिश्रणों की ओर बढ़ा, तो यह दबाव और बढ़ेगा। वाहनों को नुकसान और माइलेज घटने संबंधी चिंताओं को भी नागेश्वरन ने सिरे से खारिज नहीं किया है। बल्कि कहा है कि ई-20 से रबर सील और कार्ब्यूरेटर वाले पुराने वाहनों में समस्या हो सकती है। तकरीबन आठ करोड़ पुराने दोपहिया वाहनों के लिए तो यह ईंधन निश्चित रूप से हानिकारक है। इसलिए उन्होंने ई-10 को वापस लाने तथा जल एवं फसल संबंधी चिंताओं का ठोस आकलन करने की सलाह दी है। सरकार को अविलंब और बेहिचक इस दिशा में कदम बढ़ाने चाहिए।






