नई दिल्ली, (आरएनएस)। सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षक शिक्षा के महत्व पर जोर देते हुए कहा है कि गुणवत्तापूर्ण स्कूली शिक्षा के संवैधानिक वादे को पूरा करने में राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक प्रधान की पीठ ने कहा कि शिक्षक शिक्षा, संविधान के अनुच्छेद 21ए के तहत बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है। अदालत ने एनसीटीई और उससे जुड़े निकायों की जिम्मेदारियों को संभवत: सभी जिम्मेदारियों में सबसे महत्वपूर्ण बताया।
3 सितंबर को दिए अपने फैसले में शीर्ष अदालत ने एनसीटीई की कार्यकारी समिति के सदस्य सचिव द्वारा जारी सार्वजनिक सूचना को वैध ठहराया। इस सूचना के माध्यम से शिक्षक शिक्षा संस्थानों को वार्षिक प्रदर्शन मूल्यांकन रिपोर्ट दाखिल करने के लिए कहा गया था। अदालत ने दिल्ली हाई कोर्ट के 13 मार्च, 2023 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें एनसीटीई की 22 सितंबर, 2019 की सार्वजनिक सूचना को मनमाना और गैरकानूनी करार दिया गया था।
पीठ की ओर से फैसला लिखते हुए न्यायमूर्ति नरसिम्हा ने कहा कि शिक्षक राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और शैक्षणिक संस्थानों को आवश्यक आधार प्रदान करते हैं। उन्होंने कहा कि बच्चों का विकास और उनका जीवन प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक की भूमिका से गहराई से जुड़ा हुआ है। ऐसे में शिक्षकों को तैयार करने वाली संस्थाओं की गुणवत्ता और जवाबदेही सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक है।
अदालत ने कहा कि शिक्षकों को तैयार करने और प्रशिक्षित करने वाले संस्थानों के कामकाज में ईमानदारी, दक्षता और जवाबदेही सुनिश्चित करना एनसीटीई की प्रमुख जिम्मेदारी है।
को देशभर में शिक्षक शिक्षा व्यवस्था के योजनाबद्ध और समन्वित विकास की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
पीठ ने ‘दिनेश बिवाजी अष्टीकर बनाम महाराष्ट्र राज्य एवं अन्य’ मामले में दिए गए 2026 के फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि प्राथमिक शिक्षा के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता देने के बाद गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी विभिन्न पक्षों पर आती है।
अदालत के अनुसार इनमें संबंधित सरकार, स्थानीय प्राधिकरण, पड़ोस के विद्यालय, माता-पिता एवं अभिभावक और प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक शामिल हैं। शीर्ष अदालत ने कहा कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए शिक्षक शिक्षा संस्थानों और राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद को भी इन जिम्मेदार पक्षों में शामिल करना होगा।
पीठ ने कहा कि शिक्षक शिक्षा संस्थान वे मान्यता प्राप्त संस्थान हैं, जो शिक्षकों को तैयार करने और प्रशिक्षित करने के लिए पाठ्यक्रम संचालित करते हैं। इन संस्थानों को पूर्व-प्राथमिक, प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर पर पढ़ाने के लिए शिक्षकों को तैयार करने के साथ शिक्षा, अनुसंधान और प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित करने होते हैं।
इनकी जिम्मेदारी गैर-औपचारिक शिक्षा, अंशकालिक शिक्षा, वयस्क शिक्षा और पत्राचार शिक्षा के लिए शिक्षकों को तैयार करने तक भी विस्तृत है। इसलिए इन संस्थानों के कामकाज की नियमित निगरानी और उनकी जवाबदेही सुनिश्चित करना आवश्यक है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एनसीटीई और उसकी कार्यकारी समिति को शिक्षक शिक्षा संस्थानों से वार्षिक प्रदर्शन मूल्यांकन रिपोर्ट मांगने का पूरा अधिकार है। अदालत ने कहा कि देश में शिक्षक शिक्षा व्यवस्था के योजनाबद्ध और समन्वित विकास के लिए कानून के तहत अधिकार प्राप्त संस्था द्वारा उठाए गए नियामकीय कदम को केवल इस आधार पर नहीं रोका जा सकता कि संस्थानों से प्रदर्शन मूल्यांकन रिपोर्ट मांगी गई है।
अदालत ने कहा कि परिषद और उसके संबंधित निकायों के लिए शैक्षणिक संस्थानों की जवाबदेही सुनिश्चित करना आवश्यक है। इसलिए कार्यकारी समिति के सदस्य सचिव द्वारा जारी सार्वजनिक सूचना कानूनी और वैध थी।
इस सूचना को इस आधार पर चुनौती दी गई थी कि ऐसी सूचना जारी करने और उसे लागू करने का अधिकार केवल एनसीटीई को है, उसकी कार्यकारी समिति को नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।
पीठ ने कहा कि एनसीटीई और उसकी कार्यकारी समिति को शिक्षक शिक्षा संस्थानों से वार्षिक प्रदर्शन मूल्यांकन रिपोर्ट मांगने का अधिकार प्राप्त है। अदालत ने स्पष्ट किया कि परिषद की नियामकीय शक्तियों का उद्देश्य शिक्षक शिक्षा व्यवस्था की गुणवत्ता और जवाबदेही सुनिश्चित करना है।
न्यायमूर्ति नरसिम्हा ने कहा कि संविधान ने छह से 14 वर्ष की आयु के सभी बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य प्रारंभिक शिक्षा को अनुच्छेद 21ए के तहत मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी है। इसके बाद शिक्षक शिक्षा का महत्व और बढ़ जाता है।
अदालत ने बच्चों के मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार अधिनियम, 2009 के प्रावधानों का भी उल्लेख किया। अधिनियम की धारा 23 गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अधिकार को प्रभावी रूप से लागू करने के लिए योग्य शिक्षकों की आवश्यकता को मान्यता देती है और शिक्षकों के लिए न्यूनतम योग्यता निर्धारित करने के लिए एक शैक्षणिक प्राधिकरण का प्रावधान करती है।
पीठ ने कहा कि धारा 23 के तहत परिकल्पित शैक्षणिक प्राधिकरण राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद अधिनियम, 1993 के तहत गठित राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद है। अदालत ने कहा कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का लक्ष्य तभी प्रभावी रूप से हासिल किया जा सकता है, जब शिक्षकों को तैयार करने वाली संस्थाओं की गुणवत्ता, कार्यप्रणाली और जवाबदेही पर भी पर्याप्त ध्यान दिया जाए।
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