देहरादून,(आरएनएस)। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में गुरुवार की रात एक ऐसा खौफनाक मंजर देखने को मिला, जिसने स्वास्थ्य महकमे के दावों और सिस्टम की खोखली व्यवस्था की पोल खोल कर रख दी। राजकीय दून मेडिकल कॉलेज अस्पताल के पीकू (बाल गहन चिकित्सा इकाई) वार्ड में अचानक बत्ती गुल हो गई और करोड़ों के बजट वाले अस्पताल का पावर बैकअप सिस्टम भी पूरी तरह फेल हो गया। मशीनें बंद होने से वेंटिलेटर के सहारे जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहे 10 मासूम बच्चों की सांसें अटक गईं। गनीमत यह रही कि वार्ड में मौजूद डॉक्टरों ने भगवान बनकर तुरंत मोर्चा संभाला और एंबु बैग के जरिए अपने हाथों से पंप कर 10 मिनट तक बच्चों को मौत के मुंह में जाने से रोक लिया।
अंधेरा छाते ही अस्पताल में मच गई चीख-पुकार
यह रूह कंपा देने वाली घटना गुरुवार रात करीब 11:20 बजे की है। ओटी इमरजेंसी भवन की बिजली अचानक चली गई। बिजली जाते ही पीकू वार्ड का यूपीएस भी ठप पड़ गया और बैकअप के लिए लगाया गया जनरेटर का पैनल हैंग हो गया। देखते ही देखते पूरे वार्ड में घुप्प अंधेरा छा गया और मशीनों की बीप-बीप शांत हो गई। वेंटिलेटर पर एक सात महीने का मासूम, दो साल, पांच साल और पंद्रह साल की बच्चियां जिंदगी की जंग लड़ रही थीं। बिजली कटते ही उपकरण बंद हो गए और परिजनों की सांसें भी हलक में अटक गईं। हालात बेकाबू होते देख बाल रोग विभागाध्यक्ष डॉ. अशोक कुमार, पीजी चिकित्सकों और स्टाफ ने तुरंत एंबु बैग उठाया और मैनुअल तरीके से बच्चों के फेफड़ों तक हवा पहुंचानी शुरू की। करीब 10 मिनट तक हाथों से बैग दबाकर बच्चों की सांसें चलाई गईं, जिसके बाद जनरेटर चालू हुआ।
एक साल से खराब थीं बैटरियां, चार चि_ियों के बाद भी सोता रहा प्रशासन
इस गंभीर लापरवाही ने अस्पताल प्रशासन के काम करने के तरीके पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। जानकारी के मुताबिक, पीकू जैसी अति संवेदनशील इकाई में वेंटिलेटर की बैटरियां पिछले एक साल से खराब पड़ी थीं। हैरान करने वाली बात यह है कि इस खामी को दूर करने और यूपीएस दुरुस्त कराने के लिए संबंधित विभाग को साल भर में चार बार पत्र लिखे जा चुके थे, लेकिन अधिकारियों के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। रोजाना होने वाले निरीक्षण महज एक औपचारिकता बनकर रह गए और किसी भी अधिकारी ने इस ‘टाइम बम’ पर ध्यान देना जरूरी नहीं समझा।
घटना के बाद जागी नींद, प्राचार्य ने मांगी पूरी रिपोर्ट
सिस्टम की इस बड़ी चूक के बाद अब अस्पताल प्रशासन लीपापोती में जुट गया है। घटना की जानकारी मिलने पर अस्पताल की प्राचार्य डॉ. गीता जैन ने चिकित्सा अधीक्षक को व्यवस्थाएं तत्काल दुरुस्त करने के निर्देश देते हुए पूरे मामले की विस्तृत रिपोर्ट तलब की है। वहीं, चिकित्सा अधीक्षक डॉ. आरएस बिष्ट का कहना है कि लोड अधिक होने के कारण यह तकनीकी समस्या आई थी। अब लोड का आकलन कराया जा रहा है और यूपीएस की क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ वेंटिलेटर की बैटरियां भी बदली जा रही हैं। हालांकि, सवाल यह बना हुआ है कि जब तक किसी मासूम की जान पर नहीं बन आती, तब तक हमारा सिस्टम नींद से क्यों नहीं जागता।








