चावल अनुसंधान एवं संरक्षण को बढ़ावा : राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण ने जारी किए 8.22 करोड़ रुपये

Join Us

 चावल की भारतीय किस्मों के व्यावसायिक उपयोग से प्राप्त लाभ अनुसंधान संस्थानों और राज्यों के साथ साझा किए गए
नई दिल्ली, (आरएनएस)। राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (एनबीए) ने चावल की भारतीय किस्मों के व्यावसायिक उपयोग से प्राप्त लाभों के निष्पक्ष वितरण के तहत तीन अनुसंधान संस्थानों तथा 33 राज्य जैव विविधता बोर्डों एवं केंद्र शासित प्रदेश जैव विविधता परिषदों को कुल 8.22 करोड़ रुपये जारी किए हैं। इसे चावल के लिए अब तक के सबसे बड़े पहुंच एवं लाभ-साझाकरण (एबीएस) वितरणों में से एक माना जा रहा है।
यह राशि अंतरराष्ट्रीय बीज कंपनी मेसर्स पायनियर ओवरसीज कॉर्पोरेशन से प्राप्त हुई है, जिसने भारतीय चावल (ओराइज़ा सैटिवा) की किस्मों का उपयोग कर संकर बीज विकसित किए और उनका व्यावसायिक उपयोग किया। यह पहल देश के जैविक संसाधनों के उपयोग से प्राप्त लाभों को संरक्षकों और संबंधित संस्थानों के साथ साझा करने की भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाती है।
कुल राशि में से 2.47 करोड़ रुपये उन अनुसंधान संस्थानों को दिए गए हैं, जिन्होंने चावल की विभिन्न किस्मों का संरक्षण किया और उन्हें अनुसंधान एवं विकास के लिए उपलब्ध कराया। इनमें आईसीएआर-भारतीय चावल अनुसंधान संस्थान, हैदराबाद को सबसे अधिक 2.43 करोड़ रुपये प्राप्त हुए, जबकि गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उत्तराखंड को उसकी ओर से उपलब्ध कराई गई विशेष चावल की किस्म के लिए 3.26 लाख रुपये दिए गए।
शेष 5.75 करोड़ रुपये कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के एकीकृत कृषि सांख्यिकी पोर्टल में दर्ज धान उत्पादक क्षेत्र के आधार पर 33 राज्य जैव विविधता बोर्डों और केंद्र शासित प्रदेश जैव विविधता परिषदों के बीच वितरित किए गए। इस वितरण में उत्तर प्रदेश को सबसे अधिक 73.26 लाख रुपये मिले, जबकि पश्चिम बंगाल को 64.95 लाख रुपये, तेलंगाना को 50.60 लाख रुपये, ओडिशा को 48.09 लाख रुपये और छत्तीसगढ़ को 45.91 लाख रुपये प्रदान किए गए। इसके अतिरिक्त पंजाब, बिहार, मध्य प्रदेश, असम और आंध्र प्रदेश भी शीर्ष दस लाभार्थी राज्यों में शामिल रहे।
एनबीए के अनुसार, अनुसंधान संस्थान इस राशि का उपयोग चावल के जर्मप्लाज्म संरक्षण, बीज संग्रहों के रखरखाव, अनुसंधान गतिविधियों और प्रशिक्षण कार्यक्रमों को सुदृढ़ करने में करेंगे। वहीं राज्य जैव विविधता बोर्ड एवं परिषदें इस धनराशि का उपयोग देशी फसल किस्मों के संरक्षण, पारिस्थितिकी तंत्र के पुनर्स्थापन, पारंपरिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण तथा स्थानीय किसानों और ज्ञानधारकों को प्रोत्साहन देने जैसी संरक्षण गतिविधियों में करेंगी।
राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण ने बताया कि उसे अब तक केवल कृषि एवं बीज क्षेत्र से ही लगभग 83 करोड़ रुपये का एबीएस भुगतान प्राप्त हो चुका है, जबकि सभी क्षेत्रों को मिलाकर कुल लाभ-साझाकरण वितरण 162 करोड़ रुपये से अधिक हो गया है।
प्राधिकरण के अनुसार यह पहल कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता ढांचा के लक्ष्य-13 के अनुरूप है, जिसका उद्देश्य आनुवंशिक संसाधनों और उनसे जुड़े पारंपरिक ज्ञान के उपयोग से प्राप्त लाभों का निष्पक्ष एवं समान वितरण सुनिश्चित करना है।

साथ ही यह पहल सतत विकास लक्ष्यों के अंतर्गत शून्य भूख, जिम्मेदार उपभोग एवं उत्पादन, भूमि पर जीवन तथा लक्ष्यों के लिए साझेदारी जैसे उद्देश्यों को भी मजबूती प्रदान करती है।
उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अधीन जैविक विविधता अधिनियम, 2002 के तहत स्थापित एक वैधानिक निकाय है, जो देश के जैविक संसाधनों एवं उनसे जुड़े पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण, उपयोग और लाभ-साझाकरण की व्यवस्था को विनियमित करता है।
00

Previous articleनशा मुक्त युवा विकसित भारत की सबसे बड़ी ताकत बनेगा : प्रधानमंत्री मोदी