जन्म-मृत्यु रजिस्ट्रेशन में देरी की तो काटने होंगे कोर्ट के चक्कर; मोदी सरकार ला रही संशोधन बिल

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नई दिल्ली(आरएनएस)। केंद्र सरकार जन्म और मृत्यु के विलंबित पंजीकरण की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और सख्त बनाने की तैयारी में है। इसके लिए जन्म और मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) विधेयक, 2026 संसद सदस्यों के बीच वितरित कर दिया गया है। प्रस्तावित संशोधन के तहत दो वर्ष से अधिक की देरी से होने वाले जन्म या मृत्यु पंजीकरण के लिए अब केवल प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट की अनुमति मिलने के बाद ही पंजीकरण किया जा सकेगा।सरकार का मानना है कि इस व्यवस्था से नागरिक पंजीकरण प्रणाली की विश्वसनीयता बढ़ेगी, फर्जी दावों पर अंकुश लगेगा और लोगों को समय पर जन्म एवं मृत्यु की सूचना दर्ज कराने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा।
वर्तमान व्यवस्था के अनुसार यदि जन्म या मृत्यु का पंजीकरण एक वर्ष से अधिक देरी से कराया जाता है, तो जिला मजिस्ट्रेट, उपखंड मजिस्ट्रेट अथवा कार्यपालक मजिस्ट्रेट की अनुमति आवश्यक होती है।
प्रस्तावित संशोधन के तहत विलंबित पंजीकरण को दो श्रेणियों में विभाजित किया गया है।
एक वर्ष से दो वर्ष तक की देरी: मौजूदा व्यवस्था जारी रहेगी। संबंधित क्षेत्र के जिला मजिस्ट्रेट, उपखंड मजिस्ट्रेट अथवा कार्यपालक मजिस्ट्रेट की अनुमति के बाद पंजीकरण किया जाएगा।
दो वर्ष से अधिक की देरी: ऐसे मामलों में केवल प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेश के बाद ही जन्म या मृत्यु का पंजीकरण संभव होगा। इससे अत्यधिक विलंब वाले मामलों की जांच न्यायपालिका की निगरानी में होगी।
विधेयक में स्पष्ट किया गया है कि विलंबित पंजीकरण की अनुमति देने से पहले नामित अधिकारी को जन्म या मृत्यु की सूचना की सत्यता का विस्तृत सत्यापन करना होगा। इसके अलावा, विलंबित पंजीकरण के लिए निर्धारित शुल्क भी देना होगा। शुल्क की राशि का निर्धारण बाद में अधिसूचित नियमों के माध्यम से किया जाएगा।
जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण अधिनियम, 1969 के अनुसार जन्म और मृत्यु का पंजीकरण अनिवार्य है।
जन्म प्रमाण पत्र किसी भी नागरिक का पहला वैधानिक पहचान दस्तावेज माना जाता है। इसकी आवश्यकता विद्यालय में प्रवेश, पासपोर्ट, आधार नामांकन, मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने, सरकारी नौकरियों, विवाह पंजीकरण, उत्तराधिकार, सरकारी योजनाओं तथा अन्य प्रशासनिक एवं कानूनी कार्यों में होती है।
इसी प्रकार मृत्यु प्रमाण पत्र उत्तराधिकार संबंधी मामलों, बीमा दावों, पेंशन लाभ, संपत्ति हस्तांतरण, बैंक खातों के समापन तथा सरकारी अभिलेखों को अद्यतन करने के लिए आवश्यक कानूनी दस्तावेज है।
सरकार ने वर्ष 2023 में जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण कानून में व्यापक संशोधन कर डिजिटल और एकीकृत पंजीकरण प्रणाली लागू की थी। उस संशोधन के बाद जन्म प्रमाण पत्र को अनेक सरकारी और प्रशासनिक कार्यों के लिए एकल दस्तावेज का दर्जा दिया गया था।
हालांकि सरकार का मानना है कि विलंबित पंजीकरण से जुड़े प्रावधानों को और अधिक प्रभावी बनाने की आवश्यकता है। प्रस्तावित संशोधन का उद्देश्य वर्षों बाद होने वाले पंजीकरण पर सख्त निगरानी रखना और नागरिकों को निर्धारित समय सीमा के भीतर सूचना देने के लिए प्रेरित करना है।
सरकार का मानना है कि दो वर्ष से अधिक की देरी वाले मामलों में न्यायिक निगरानी लागू होने से फर्जी अथवा अप्रमाणित दावों के आधार पर जन्म या मृत्यु प्रमाण पत्र प्राप्त करना कठिन हो जाएगा। वहीं वास्तविक कारणों से विलंब करने वाले नागरिकों के लिए पंजीकरण का वैधानिक मार्ग खुला रहेगा, हालांकि उन्हें अपने दावे की प्रामाणिकता सिद्ध करनी होगी।
उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता एवं संवैधानिक विशेषज्ञ सत्य प्रकाश सिंह के अनुसार, दो वर्ष से अधिक की देरी वाले मामलों में प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट की अनुमति अनिवार्य होने से फर्जी दावों की गहन न्यायिक जांच सुनिश्चित होगी। उन्होंने कहा कि इससे वास्तविक आवेदकों के अधिकार प्रभावित नहीं होंगे, बल्कि उन्हें केवल जन्म या मृत्यु की सत्यता के संबंध में न्यायालय को संतुष्ट करना होगा।
उन्होंने विश्वास जताया कि यदि संशोधित व्यवस्था प्रभावी ढंग से लागू होती है तो नागरिक समय पर जन्म एवं मृत्यु का पंजीकरण कराने के लिए प्रेरित होंगे और देश की नागरिक पंजीकरण प्रणाली अधिक विश्वसनीय, पारदर्शी तथा सुदृढ़ बनेगी।

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