-डीपफेक वीडियो और भ्रामक डिजिटल सामग्री के खिलाफ बॉम्बे हाई कोर्ट पहुंचे केंद्रीय मंत्री
मुंबई,(आरएनएस)। केंद्रीय सडक़ परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने बॉम्बे हाई कोर्ट में दायर अपनी याचिका में स्पष्ट किया है कि पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने की सरकारी योजना से उनका कोई व्यक्तिगत या आधिकारिक संबंध नहीं है। उन्होंने कहा कि इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल कार्यक्रम और ई-20 पहल से जुड़े किसी भी निर्णय, नीति निर्माण या संचालन प्रक्रिया में उनकी कोई भूमिका नहीं है।
गडकरी ने यह याचिका कथित रूप से कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) से तैयार किए गए डीपफेक वीडियो और छेड़छाड़ की गई डिजिटल सामग्री के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग को लेकर दायर की है। उनका आरोप है कि कुछ डिजिटल माध्यमों पर उनके और उनके परिवार को इथेनॉल योजनाओं से गलत तरीके से जोडक़र भ्रामक जानकारी प्रसारित की गई, जिससे उनकी सार्वजनिक छवि को नुकसान पहुंचाने का प्रयास किया गया।
गडकरी ने अपनी याचिका में कहा है कि इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल कार्यक्रम और ई-20 पहल का संचालन केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय द्वारा किया जाता है। इन योजनाओं से संबंधित नीतिगत निर्णय, प्रक्रिया और कार्यान्वयन में उनका कोई दखल नहीं है।
उन्होंने अदालत से मांग की है कि उनके खिलाफ गलत जानकारी फैलाने वाली सामग्री को हटाने के निर्देश दिए जाएं और ऐसी सामग्री के प्रसार पर रोक लगाई जाए।
रिपोर्ट के अनुसार, बॉम्बे हाई कोर्ट ने नितिन गडकरी को मेटा, एक्स कॉर्प और गूगल एलएलसी सहित कई डिजिटल मंचों के खिलाफ दीवानी मुकदमा दायर करने की अनुमति दे दी है।
गडकरी ने आरोप लगाया है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता की मदद से तैयार किए गए फर्जी वीडियो और बदली हुई डिजिटल सामग्री के माध्यम से उनके बारे में गलत दावे किए गए। अदालत अब आपत्तिजनक सामग्री हटाने और उस पर अंतरिम रोक लगाने की उनकी मांग पर सुनवाई करेगी।
नितिन गडकरी ने इससे पहले इथेनॉल कारोबार को लेकर उठ रहे आरोपों पर सफाई देते हुए कहा था कि उनके बेटों की कंपनियों की इथेनॉल क्षेत्र में हिस्सेदारी 0.5 प्रतिशत से भी कम है और इससे उन्हें कोई व्यक्तिगत आर्थिक लाभ नहीं मिलता।
उन्होंने बताया था कि उनके बेटों की कंपनियों पर करीब 1,600 करोड़ रुपये का कर्ज है। गडकरी ने इथेनॉल योजना से व्यक्तिगत लाभ मिलने के आरोपों को निराधार और गलत जानकारी पर आधारित बताया।
केंद्रीय मंत्री का कहना है कि डिजिटल माध्यमों पर प्रसारित की गई भ्रामक सामग्री का उद्देश्य उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाना है। उन्होंने अदालत से ऐसे मामलों में प्रभावी कार्रवाई और डिजिटल मंचों को जिम्मेदार ठहराने की मांग की है।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत यह तय करेगी कि कथित आपत्तिजनक सामग्री को हटाने और उसके प्रसार को रोकने के लिए क्या अंतरिम निर्देश जारी किए जा सकते हैं।








