रुपये को सहारा देने के लिए सरकार का बड़ा दांव, विदेशी निवेशकों को एलटीसीजी टैक्स से मिली पूरी छूट

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रुपये पर बढ़ते दबाव और विदेशी पूंजी के लगातार पलायन के बीच केंद्र सरकार ने विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने के लिए बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने शुक्रवार को एक अध्यादेश जारी कर आयकर अधिनियम में संशोधन करते हुए विदेशी संस्थागत निवेशकों  द्वारा सरकारी प्रतिभूतियों में किए गए निवेश पर लगने वाले दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ कर  को पूरी तरह समाप्त कर दिया है।
सरकार का मानना है कि इस फैसले से भारतीय सरकारी बॉन्ड बाजार विदेशी निवेशकों के लिए अधिक आकर्षक बनेगा और देश में दीर्घकालिक विदेशी पूंजी का प्रवाह बढ़ेगा। चूंकि सरकारी प्रतिभूतियां आमतौर पर लंबी अवधि के निवेश साधन होती हैं, इसलिए कर छूट का उद्देश्य स्थिर और टिकाऊ निवेश को प्रोत्साहित करना है।
इस अध्यादेश से पहले विदेशी निवेशकों को इक्विटी और डेट निवेश से होने वाले दीर्घकालिक लाभ पर 12.5 प्रतिशत रुञ्जष्टत्र टैक्स देना पड़ता था। जुलाई 2024 के बजट में यह दर 10 प्रतिशत से बढ़ाकर 12.5 प्रतिशत की गई थी।
यह फैसला ऐसे समय में आया है जब भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक अनिश्चितताओं के कारण विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से बड़े पैमाने पर धन निकाला है। इससे न केवल पूंजी बाजार प्रभावित हुआ है, बल्कि भारतीय मुद्रा पर भी दबाव बढ़ा है।
महंगे कच्चे तेल, बढ़ते व्यापार घाटे और वैश्विक आर्थिक चुनौतियों के कारण रुपये में लगातार कमजोरी देखने को मिली है। विदेशी निवेशकों की निकासी और डॉलर की बढ़ती मांग ने रुपये को रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंचा दिया, जिससे भारतीय रिजर्व बैंक (क्रक्चढ्ढ) को विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप करना पड़ा।
रुपये को स्थिर रखने के लिए आरबीआई लगातार अपने विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग कर रहा है। डॉलर की बिक्री के चलते हाल के महीनों में विदेशी मुद्रा भंडार में भी गिरावट दर्ज की गई है। इसके साथ ही आरबीआई ने कुछ दीर्घकालिक सरकारी बॉन्ड को पूरी तरह सुलभ श्रेणी (स्नह्वद्यद्य4 ्रष्ष्द्गह्यह्यद्बड्ढद्यद्ग क्रशह्वह्लद्ग) में शामिल कर विदेशी निवेशकों के लिए निवेश के रास्ते और आसान कर दिए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि पूंजीगत लाभ कर से छूट मिलने के बाद विदेशी निवेशकों का शुद्ध रिटर्न बढ़ेगा, जिससे भारतीय सरकारी बॉन्ड बाजार में उनकी भागीदारी बढ़ सकती है। इससे देश में विदेशी मुद्रा का प्रवाह मजबूत होगा, वित्तीय बाजारों में तरलता बढ़ेगी और सरकार को बुनियादी ढांचा एवं विकास परियोजनाओं के लिए संसाधन जुटाने में मदद मिलेगी।
सरकार का यह कदम भारतीय वित्तीय बाजारों को वैश्विक निवेशकों के लिए अधिक प्रतिस्पर्धी और आकर्षक बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण नीतिगत बदलाव माना जा रहा है। इससे न केवल निवेशकों का भरोसा मजबूत होगा, बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था में दीर्घकालिक विदेशी निवेश को भी नई गति मिलने की उम्मीद है।

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