आजादी के दिवाने थे विचित्र कुमार सिन्हा जी
१४ फरवरी जन्मतिथि पर विशेष
चुम्बकीय व्यक्तित्व वाले श्री विचित्र कुमार सिन्हा में किसी को अपना बनाने की अद्भुत क्षमता थी। वे सहज ही किसी को अपना बनाने की कला में उसी प्रकार सिद्धहस्त थे जैसे भृंगीकीट अपने अनुकूल अन्य कीट को बनाने में समर्थ होता हैै। यह कथन श्री विचित्र कुमार सिन्हा पर शत प्रतिशत सत्य है कि वे परिचितों को ही नहीं अपरिचितों तक को अपना बनाने की कला में पारंगत थे। तभी वे मणिकांचन संयोग उत्पन्न करने में प्रवीण थे। वस्तुत: वे अनेक गुणों के स्त्रोत थे। उनेक व्यक्तित्व में साहित्यिक, राजनीतिक, सामाजिक धाराओं से बढक़र मानवीय धारा का अजस्त्र प्रवाह था। उनके व्यक्तित्व को अलग-अलग खण्डों में बाँटा देखना कठिन सा ही नहीं वरन् असंभव भी है। उनका स्वरूप सर्वत्र दृष्टिïगोचर होता था। उनमें सिद्घांतों पर अटल रहने की दृढ़ता थी तो मानवीय मूल्यों के प्रति सहज सह्दयता भी थीं।
श्री विचित्र कुमार सिन्हा भोपाल की माटी में ऐसे रच-बस गये थे कि वे आजीवन इसी के होकर रह गये थे। वे भोपाल की साहित्यिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, पत्रकारिता के अभिन्न अंग बन गये थे। किसी व्यक्ति का एक क्षेत्र में ही स्थान बनाना प्राय: कठिन होता है किन्तु उन्होंने अपने कौशल से सभी क्षेत्रों में ऐसा स्थान बनाया जिससे वे सदा चिर स्मरणीय बन गये। उन्होंने अपनी प्रतिभा-पौरूष से भोपाल की माटी को धन्य किया। वे मात्र भोपाल के परिवेश-परिदृश्य, युग-युति के साक्षी ही नहीं थे वरन् अपरिहार्य अंग भी थे। इसीलिये वे अनुपम अनूठे व्यक्ति बन गये थे। भले ही उन्होंने अवसरवादी बन कर धन न कमाया हो किन्तु विपुल यशोधन के स्वामी अवश्य थे। उनका आदर्श जीवन प्रेरक तथा प्रतिष्ठित रहा हैै।
वस्तुत: स्वतंत्रता संग्राम के जिस दौर में और जिस पीढ़ी के मध्य वे खड़े थे उस काल में सुख-सुविधाओं का परित्याग कर कबीर की भांति उद्घोष कर निकल पड़े कि ”कबिरा खड़ा बाजार में, लिये लुकाठी हाथ, जो घर जारे आपना, चले हमारे साथज्ज्। सचमुच वे अंगारों से खेलने और विदेशी दासता से टकराने चल पड़े। परिणामों की परवाह किये बिना वे तलवार की धार पर चलते रहे, जहां पग-पग पर लहूलुहान होने का जबरर्दस्त खतरा था। फिर भी वे स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने और मातृभूमि पर बलिदान होने की भावना से भरकर निकल पड़े। मात्र पन्द्रह वर्ष की आयु में ही वे स्वतंत्रता संग्राम की अग्नि में कूद पड़े। उन्होंने सन् १९३१ में झण्डा आंदोलन में सक्रिय भागीदारी के फलस्वरूप होशंगाबाद जेल में प्रथम बार चार माह के कारावास की सजा काटी। इसके बाद सन् १९४२ का वह काल आया जब सारे देश में अंग्रेजों के विरूद्घ खुला विद्रोह छिड़ गया। गांधी जी के ”करो या मरोज्ज् के आंदोलन की चिंगारी जगह-जगह ज्वाला बनकर फैल गई। एक ओर क्रांतिकारी अंग्रेजों के छक्के छुड़ाने में लड़े थे तो दूसरी ओर प्रशसान उन्हें जेलों में ठूंसने, लाठी-डण्डा, गोली मारने के लिये कमर कस लिया था। ऐसे समय में विचित्र कुमार जी चुपचाप कहां बैठने वाले थे वे स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े और मुंगावली जेल में बंद कर दिये गये। इसके बाद सन् १९४४ में भैरोगढ़ जेल तत्पश्चात् १९४७ में राजनांदगांव जेल में बंद किये गये। यह उनका युवाकाल था। मात्र २३ वर्ष की आयु में वे ९ माह से अधिक समय तक जेल की यात्राएं की और ब्रिटिश सरकार की यातनाएं झेली।
विचित्र कुमार जी की राजनैतिक जागरूकता और उनकी स्वतंत्रता संग्राम की पिपासा ने उन्हें पत्रकारिता की दिशा में प्रेरित कर उनकी लेखनी को धारदार बनाने तथा जनता को जागृत करने को अग्रसर किया। वे भोपाल अंचल की जनता को जगाने तथा स्वतंत्रता संग्राम की मुख्य धारा से जोडऩे के लिये ”प्रजा की पुकारज्ज्, ”पंचशीलज्ज् तथा ”हिन्दी ब्लिट्जज्ज् जैसे समाचार-पत्र-पत्रिका के माध्यम से जन जागृति उत्पन्न करने लगे। उनके द्वारा सन् १९७३ में भोपाल से प्रारंभ किये गये साप्ताहिक ”विचित्र विनोदज्ज् के माध्यम से राजनैतिक, सामाजिक, साहित्यिक जागरूकता उत्पन्न करने लगे। देश सेवा के पुनीत कार्यों को गति देने के लिये उनके सुपुत्र कृष्णकांत सक्सेना ने सन् १९९५ से उनके अवसान के बाद भी दैनिक ”क्षितिज किरणज्ज् का प्रकाशन होशंगाबाद, जबलपुर और सीहोर से भी बीड़ा उठाकर प्रकाशन कार्य कर रहे है।
श्री विचित्र कुमार सिनहा जिन्हें हम लोग आदर से बाबूजी कहते थे, एक ऐसे साहित्य सेवी थे जिनकी गणना प्रख्यात साहित्यकारों में की जाती थीं। साहित्य की लगभग सभी विधाओं में उन्होंने अपनी लेखनी चलाई थी। कविता-कहानी-लेख-व्यंग के क्षेत्र में तो उन्होंने काफी ख्याति अर्जित की थी। उनकी कहानियाँ ”धरती पुत्रज्ज्, ”स्वयंवराज्ज्, तथा ”बदरा बरस गयेज्ज् का तो फिल्मांकन भी सम्पन्न हुआ। विचित्र कविराय के नाम से रचित उनकी कुण्डलियाँ तो विशेष रूप से आज भी चर्चित है। कुण्डलियों के माध्यम से सम सामयिक विषयों-घटनाक्रमों पर लेखनी चलाकर अपनी विशिष्टï पहचान बनाई हैै। मेरी तो दृढ़ मान्यता है कि यदि बाबूजी मात्र साहित्यकार होते तो साहित्य की अमूल्य सेवा से साहित्य जगत को धन्य कर देते किन्तु समय की मांग तथा युग की आहट को अनसुना न करते हुए राजनैतिक तथा सामाजिक समस्याओं से जूझने के लिये अपने को बिना आगा-पीछा सोचे स्वतंत्रता की डगर पर चल पड़े। श्री लालबहादुर शास्त्री, जिन्हें वे अपना पथ प्रदर्शक तथा सलाहकार मानते थे उनकी ही प्रेरणा से वे अपने सिद्घांतों पर बिना किसी लोभ-मोह के डटे रहे। रायगढ़ रियासत औैर भोपाल के विलीनीकरण आंदोलन में भी उनका सराहनीय योगदान रहा है जिसे भुलाया नहीं जा सकता।
बाबूजी के संपर्क में अदृश्य रूप से आज भी हमें प्रतीत होता हैै कि बाबूजी का वरदहस्त हमारे सिर पर है और हमें हर विचलन में सहारा देता रहता हैै। आज के बढ़ते संवेदनहीन समय में उन जैसे अत्यंत संवेदनशील महापुरूषों की बड़ी याद आती हैै, जो परिचित या अपिरिचित सभी के लिये ढाल जैसा खड़े दिखाई देते थे। ऐसे बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी व्यक्ति किसके आकर्षण के केन्द्र नहीं हो सकते ? और किसके आत्मीय नहीं होंगे?
-श्रीमती उषा जायसवाल
८४, प्रिंस कॉलोनी,
लोअर ईदगाह हिल्स, भोपाल, म.प्र.






