न्याय की व्यापक समझ को तिलांजलि

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समस्या आनुपातिक समानता के नाम पर दशकों से चल रही वो राजनीति है, जिसमें न्याय की व्यापक समझ को तिलांजलि दे दी गई है। इस सोच ने समाज को पुरानी जकडऩों में और भी मजबूती से बांध डाला है। उच्च शिक्षण संस्थानों में कथित जातीय भेदभाव को दूर करने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के दिशा-निर्देशों ने नई सामाजिक हलचल पैदा कर दी है। इससे संबंधित अपने आरंभिक ड्राफ्ट में आयोग ने दो बदलाव किए। उससे ये मामला भडक़ा है। शुरुआती ड्राफ्ट में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के साथ जातीय आधार पर भेदभाव के मामलों में कार्रवाई की प्रक्रिया शामिल थी। उसमें यह प्रावधान भी था कि गलत शिकायत दर्ज कराने वाले छात्र (या कर्मचारी) पर क्या कार्रवाई होगी। ड्राफ्ट का समाज के एक हिस्से की तरफ से विरोध हुआ। उसके दबाव में आकर यूजीसी ने एक तो संभावित उत्पीडऩ का शिकार होने वाले समूहों में ओबीसी जातियों को शामिल कर दिया और दूसरे गलत शिकायत से संबंधित प्रावधान को हटा दिया।नतीजा सामान्य श्रेणी वर्ग में गहरे असंतोष के रूप में सामने आया है। इन समूहों की दलील है कि जाति आधारित भेदभाव का शिकार वो भी होते हैं। इस समझ के मुताबिक जातिगत भेदभाव ताकत एवं प्रभाव की स्थिति में मौजूद हर अधिकारी कर सकता है, भले वह किसी जाति से आया हो। उनके मुताबिक यूजीसी इक्विटी विनियमन 2026 की भाषा ऐसी है, जिससे संदेश जाता है कि हर मामले में उत्पीडक़ सामान्य श्रेणी के लोग ही होते हैं। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक यूजीसी इस तर्क से सहमत नहीं है और जल्द ही वह इस बारे में स्पष्टीकरण जारी करेगा।
अगर ये खबर सच है, तो अपेक्षित होगा कि यूजीसी फौरन ऐसा करे। वरना, ये विवाद एक नई सामाजिक अशांति का कारण बनता नजर आ रहा है। वैसे, इस तरह के मामलों में तमाम तरह के स्पष्टीकरणों की अपनी सीमा है। समस्या आनुपातिक समानता के नाम पर दशकों से चल रही वो राजनीति है, जिसमें न्याय की व्यापक समझ को तिलांजलि दे दी गई है। इस सोच ने समाज को पुरानी जकडऩों में और भी मजबूती से बांध डाला है। चूंकि इस सोच में जाति के अलावा पिछड़ेपन, शोषण, एवं भेदभाव के कहीं अधिक मूलभूत दूसरे कारणों को सिरे से नजरअंदाज किया गया है, इसलिए जकडऩों को तोड़ कर आगे बढऩे की दृष्टि और सामाजिक प्रगति के रास्ते बाधित हो गए हैँ।

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