एनडीएमए के भीड़ प्रबंधन संबंधी दिशा-निर्देशों को धार्मिक आयोजनों के कर्ता-धर्ताओं ने शायद पढऩे की जरूरत भी नहीं समझी है। नतीजतन, हंसी-खुशी के मौकों पर ग़म की कहानियों का लिखा जाना जारी है! कोलकाता के चोरबागान दुर्गा पंडाल में मची भगदड़ के अगले ही दिन मध्य प्रदेश के ग्वालियर में शीतला माता मंदिर के पास दर्दनाक दुर्घटना हुई। कोलकाता में 19 और ग्वालियर में 15 श्रद्धालुओं की जान गई। हालांकि दो अलग जगहें हैं, दो घटनाएं हैं, और हादसों के शिकार पात्र अलग हैं, लेकिन दोनों दुर्घटनाओं में कई समान बातें हैं। बेशक, एक सडक़ हादसा है, दूसरा भीड़ प्रबंधन की विफलता- लेकिन दोनों की जड़ में एक ही सच्चाई छिपी है कि धार्मिक आयोजनों में सुरक्षा को लग्जरी मानने का नजरिया कायम है। ऐसा इसलिए है कि हर साल धार्मिक स्थलों पर ऐसे अनगिनत हादसे होने के बावजूद ना कोई सीख ली जाती है, और ना ही कोई प्रभावी जवाबदेही तय होती है। ग्वालियर में ट्रक उस सडक़ पर पहुंच गया जहां नो एंट्री थी और दोपहिया वाहनों तक को रोका जा रहा था। ऐसे में बैरिकेड तोड़ कर ढलान से नीचे उतरते हुए ट्रक ने कैसे श्रद्धालुओं को कुचला, यह रहस्यमय है। पुलिस को मालूम था कि नवरात्रि में भारी भीड़ होगी, फिर भी वह पुख्ता इंतजाम करने में नाकाम रही। राहत कार्य का आलाम यह था कि पीडि़त परिवारों को खुद क्रेन किराए पर लेनी पड़ी, ताकि शव बाहर निकाले जा सकें। उधर कोलकाता के चोरबागान पंडाल में एक ही निकास था, गलियां संकरी थीं, अंदर अंधेरा था, और बारिश की स्थिति में लोगों को नियमित रूप से निकालने की व्यवस्था नहीं थी। आयोजकों की सुरक्षा संबंधी घोषणा और सुरक्षा गार्डों की सीटियों ने भगदड़ को और भडक़ा दिया। गौरतलब है कि यह कोई अचानक आई आपदा नहीं थी- बीते दिनों ही बैरिकेड कई बार टूट चुके थे, फिर भी अतिरिक्त तैयारियों की जरूरत नहीं समझी गई। हादसों के बाद की कहानी भी घिसीपिटी है: कुछ पुलिसकर्मियों का निलंबन, आयोजकों की गिरफ्तारी, मुआवजे की घोषणा और जांच आयोग का गठन। जबकि राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने 2014 में ही भीड़ प्रबंधन के दिशा-निर्देश तैयार किए थे। धार्मिक आयोजनों के कर्ता-धर्ताओं ने शायद उसे पढऩे की जरूरत भी नहीं समझी है। नतीजतन, हंसी-खुशी के मौकों पर ग़म और दर्द की कहानियों का लिखा जाना जारी है!







