नई दिल्ली (ए.)। ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के आक्रामक बयानों के बीच डेनमार्क ने कड़ा रुख अपनाया है। मीडिया रिपोट्र्स के अनुसार, डेनमार्क के रक्षा मंत्रालय ने साफ चेतावनी दी है कि अगर किसी विदेशी ताकत ने उसके क्षेत्र पर हमला किया, तो सैनिक किसी आदेश का इंतजार किए बिना तुरंत जवाबी कार्रवाई करेंगे। डेनमार्क में यह नियम वर्ष 1952 से लागू है, जिसके तहत देश पर बाहरी हमला होने की स्थिति में सैनिकों को सीनियर अधिकारियों की अनुमति के बिना भी हथियार उठाने का अधिकार है। रक्षा मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि यह नियम आज भी प्रभावी है।
द्वितीय विश्व युद्ध से जुड़ा है नियम का इतिहास
इस नियम की पृष्ठभूमि वर्ष 1940 से जुड़ी है, जब जर्मनी ने डेनमार्क पर हमला किया था। उस समय संचार व्यवस्था ठप हो गई थी और सैनिकों को स्पष्ट निर्देश नहीं मिल पाए थे। इसके बाद यह फैसला लिया गया कि भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न बने, इसलिए हमला होते ही जवाब देने का अधिकार सैनिकों को दिया गया।
ग्रीनलैंड पर बढ़ता तनाव
यह चेतावनी ऐसे समय आई है, जब अमेरिका की ओर से ग्रीनलैंड को लेकर कब्जे या खरीद जैसे बयान सामने आ रहे हैं। ग्रीनलैंड अटलांटिक महासागर में स्थित एक रणनीतिक द्वीप है, जो पिछले करीब 300 वर्षों से डेनमार्क के अधीन है। इसकी विदेश और रक्षा नीति डेनमार्क ही तय करता है।
अमेरिकी कब्जे के खिलाफ जनता
पिछले साल हुए एक सर्वे में ग्रीनलैंड के 85 प्रतिशत लोगों ने अमेरिकी कब्जे का विरोध किया था। ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेंस-फ्रेडरिक नीलसन कई बार दोहरा चुके हैं कि ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है। ग्रीनलैंड और अमेरिका के बीच 1951 में हुआ रक्षा समझौता 2004 में अपडेट किया गया था, जिसमें ग्रीनलैंड की सेमी-ऑटोनॉमस सरकार को भी शामिल किया गया, ताकि अमेरिकी सैन्य गतिविधियों से स्थानीय लोगों पर असर न पड़े।
अमेरिका की सैन्य मौजूदगी
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका ने ग्रीनलैंड में कई सैन्य ठिकाने बनाए थे। युद्ध के बाद कुछ बेस बने रहे, हालांकि कोल्ड वॉर के बाद अधिकांश बंद कर दिए गए। फिलहाल अमेरिका के पास यहां पिटुफिक स्पेस बेस है, जो मिसाइल ट्रैकिंग के लिए इस्तेमाल होता है। डेनमार्क की भी सीमित सैन्य मौजूदगी है और हाल में उसने अपने बेस को अपग्रेड करने का ऐलान किया है।
ग्रीनलैंडवासियों को पैसा देने का प्रस्ताव
रिपोट्र्स के मुताबिक, व्हाइट हाउस में इस बात पर भी विचार हुआ है कि ग्रीनलैंड के नागरिकों को प्रति व्यक्ति 10 हजार डॉलर से लेकर 1 लाख डॉलर तक का भुगतान कर अमेरिका में शामिल होने के लिए राजी किया जाए।
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अगर यह योजना लागू होती है, तो करीब 57 हजार आबादी वाले ग्रीनलैंड पर इसकी लागत 5 से 6 अरब डॉलर तक आ सकती है।
सूत्रों का कहना है कि अमेरिका केवल आर्थिक प्रस्ताव ही नहीं, बल्कि कूटनीतिक और सैन्य विकल्पों पर भी विचार कर रहा है। डोनाल्ड ट्रम्प पहले भी 2019 में ग्रीनलैंड को “रियल एस्टेट डील” के रूप में खरीदने की बात कह चुके हैं, जिसे डेनमार्क और ग्रीनलैंड दोनों ने खारिज कर दिया था।
ट्रम्प का दावा और नाटो पर सवाल
ट्रम्प का कहना है कि रूसी और चीनी जहाजों की मौजूदगी के कारण ग्रीनलैंड अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बेहद अहम है। उनका मानना है कि केवल संधि या लीज पर्याप्त नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र पर नियंत्रण जरूरी है।
वहीं, डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सेन ने चेतावनी दी है कि अगर अमेरिका ने किसी नाटो सहयोगी पर हमला किया, तो नाटो और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था दोनों खतरे में पड़ जाएंगे। यूरोप के कई देशों ने भी संयुक्त बयान जारी कर कहा है कि ग्रीनलैंड के भविष्य का फैसला केवल उसके लोग और डेनमार्क ही कर सकते हैं।








