नई दिल्ली,(ए)। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बीआर गवई ने कहा है कि निजता के बिना इंसानों की गरिमा को कोई अस्तित्व नहीं है। जस्टिस गवई ने कहा है कि मानवीय गरिमा का सच्चा अर्थ व्यक्ति की निजता, उसके अपने शरीर पर स्वायत्तता और जीवन के कई मोड़ों पर फैसला लेने की स्वतंत्रता में ही निहित है। उन्होंने ये भी कहा कि न्यायपालिका ने हमेशा मानवीय गरिमा को संविधान की आत्मा के रूप में महत्व दिया है और इसे एक मूलभूत अधिकार के रूप में मान्यता दी है। मानव गरिमा संविधान की आत्मा: 21वीं सदी में न्यायिक चिंतन विषय पर नई दिल्ली में बुधवार को आयोजित 11वें डॉ. एलएम सिंघवी स्मृति व्याख्यान में बोलते हुए सीजेआई गवई ने कहा कि संविधान मानव गरिमा को स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व और न्याय का मूल मानता है। उन्होंने केएस पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ मामले में दिए गए फैसले का हवाला देते हुए कहा कि निजता के बिना गरिमा का अस्तित्व नहीं होता। दोनों ही जीवन, स्वतंत्रता और स्वाधीनता के अविभाज्य मूल्यों में निहित हैं, जिन्हें संविधान ने मान्यता दी है उन्होंने कहा कि मानवीय गरिमा एक व्यापक सिद्धांत है, जो संविधान की मूल भावना और दर्शन को रेखांकित करती है और संविधान की प्रस्तावना में व्यक्त मूल मूल्यों- स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व और न्याय को आकार देता है। बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक सीजेआई ने इस बात पर जोर दिया कि प्रजनन संबंधी विकल्पों, चिकित्सा उपचार और जीवन के अंतिम फैसलों में भी गरिमा इंसान की स्वायत्तता का आधार है। सुचिता श्रीवास्तव बनाम चंडीगढ़ प्रशासन (2009) और कॉमन कॉज़ बनाम भारत संघ (2018) का हवाला देते हुए सीजेआई ने कहा कि स्वायत्तता को गरिमा से अलग नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि अगर किसी व्यक्ति को अपने शरीर, कार्यों या जीवन की परिस्थितियों के बारे में चुनाव करने की क्षमता से वंचित किया जाता है तो यह वास्तव में वह व्यक्ति गरिमा के साथ नहीं जी सकता उन्होंने कहा कि अदालतों ने कैदियों को अमानवीय व्यवहार से लेकर महिलाओं को कार्यस्थल पर भेदभाव, श्रमिकों के शोषण और विकलांग व्यक्तियों को बहिष्कार से बचाने तक गरिमा का इस्तेमाल किया है। उन्होंने कहा कि इनमें से प्रत्येक मामले में, गरिमा ने मौलिक अधिकारों के अर्थ को व्यापक बनाया है।








