वैदिक काल से संतो, समाज और जनमानस में रहा समरसता का भाव

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समरसता सेवा संगठन ने संत गाडगे जी एवं शबरी माता जयंती पर किया विचार गोष्ठी और प्रतिभा सम्मान समारोह का आयोजन

जबलपुर। वैदिक काल से ही समरसता का भाव समाज में, संतो में और जनमानस में रहा है और हमारे संतो ने एक उद्देश्य और मिशन को लेकर कार्य किया और वह उद्देश्य किसी जाति विशेष के लिए नही रहा है यह बात डॉ अखिलेश गुमस्ता ने समरसता सेवा संगठन द्वारा संत गाडगे जी एवं शबरी माता की जयंती पर आयोजित विचार गोष्ठी और प्रतिभा सम्मान समारोह के अवसर पर टिंबर भवन मदनमहल में कही।
समरसता सेवा संगठन द्वारा मुख्य अतिथि डॉ अखिलेश गुमास्ता, मुख्य वक्ता होम साइंस कॉलेज प्राचार्य डॉ समीर शुक्ला, विशिष्ट अतिथि श्री डीसी अहिरवार, श्रीमती देवश्री मोदी, समरसता सेवा संगठन के अध्यक्ष संदीप जैन, सचिव उज्ज्वल पचौरी की उपस्थिति में विचार गोष्ठी एवं सम्मान समारोह कार्यक्रम आयोजित किया गया।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ अखिलेश गुमास्ता ने अपने संबोधन में कहा श्री रामचरित मानस में हमने पढ़ा है कि भगवान श्रीराम को लेने ऋषि विश्वामित्र को जाना पड़ा था किंतु माता शबरी से मिलने भगवान स्वयं उनकी कुटिया में पहुंचे थे, यह शबरी की प्रतीक्षा, सेवा, त्याग, समर्पण और गुरु शिष्य के भाव के प्रति आदर का प्रतिफल था, यह अपने आप में समरसता का अद्तीय उद्धरण है। कार्य कोई भी हो यदि समाज प्रेरित हो जिसमे आत्म उत्थान न होकर समाज उत्थान का भाव हो वह कार्य श्रेष्ठ होता है और हमारे संतो महात्माओं ने समाज को दिशा देने का भाव हो हमेशा रखा और इसी से उनका संतत्तव भाव भी था।

उन्होंने कहा आज के समय में भी भेदभाव और छुआछूत का भाव समाज में व्याप्त है और समरसता का भाव जन जन में जागृत करने हेतु आज विचारो को देने के साथ ही अपने अंदर भी समरसता के भाव लाने की आवश्कता है तब एक सुंदर और संगठित समाज की स्थापना होगी।

संगोष्ठी के मुख्य वक्ता डॉ समीर शुक्ला ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा सनातन संस्कृति में जो ऋषि परंपरा रही है उसी क्रम में संत गाडगे जी महाराज से त्याग की परंपरा का निर्वहन करते हुए कार्य किया और समाज को विचार दिए। संत पुरुषों के मन में छोटा बड़ा, ऊंचा नीचा का कोई भेद नहीं होता है ऐसे हो हमारे संत हुए है। माता शबरी ने भी समरसता का अनुपम उदाहरण दिया जो हर युग में उद्धरण है उनका त्याग, सेवा और भक्ति से हम सीख मिलती है।

उन्होंने कहा हमारी संस्कृति में अनेक संत हुए सभी ने अपने अपने काल में सामाजिक समरसता का संदेश दिया उनका हमे अनुपालन करना चाहिए।

उन्होंने कहा हमारे समाज में जाति की व्यवस्था कब आई? इसका विचार हमे करना होगा तब हम समरसता की ओर बढ़ सकते है। देखने में आता है विदेशी आक्रांताओं ने समाज में कुरुतिया पैदा हुई जो कालांतर में जाति भेद में बदल गई। किंतु हमारी सनातन परंपरा। में सभी को समाहित किया है चाहे वह साकार हो निराकर हो, आस्तिक हो नास्तिक हो या द्वैत, अद्वैत हो सभी को साथ लेकर चलना हमारी संस्कृति रही है इसीलिए जाति भेद की बात तो हमारी परंपरा कभी रही ही नही है सभी सामाजिक समरसता के साथ रहते थे और आगे भी यह भेद खतम करके पुनः समरस भाव से समर्थ देश के निर्माण में अपना योगदान देंगे।

कार्यक्रम की अतिथि श्रीमती देवश्री मोदी ने अपने संबोधन में कहा समरसता की बात हम आज कर रहे यह कोई नई बात नही बल्कि युगों से समरसता का भाव रहा है और इसका सबसे श्रेष्ठ उदाहरण माता शबरी और भगवान श्रीराम का है। समरसता का यह भाव आज जन मानस के बीच पहुंचाने का कार्य समरसता सेवा संगठन संदीप जैन जी के नेतृत्व में कर रहा है, यह अनुकरणीय कार्य है। आज संत गाडगे जी महाराज की जयंती भी है इन्होंने बाबा साहब अम्बेडकर, ज्योतिबा फूले के समकाल में समाज को जागृत करने का कार्य किया जिसमे बाल शिक्षा, स्त्री शिक्षा, स्वच्छता के लिए कार्य किया।

विशिष्ठ अतिथि डीसी अहिरवार ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा बाबा साहब अम्बेडकर के साथ ही हमारे संत महात्माओं ने कहा कि जिस देश में जाति समाज का भेदभाव होगा इस देश में धूर्वीकारण होता रहेगा इसीलिए आप सभी से आग्रह है सब मिलजुल का एक समान भाव से साथ रहे यह हमारा प्रयास होना चाहिए।

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