किसी पुरुष के साथ यौन संबंध बनाने की महिला की सहमति उसके निजी पलों को वीडियो में कैद करने और उसे सोशल मीडिया पर पोस्ट करने की सहमति के रूप में नहीं माना जा सकता। दिल्ली हाई कोर्ट ने यह कहते हुए दुष्कर्म के आरोपी को जमानत देने से इंकार कर दिया। आरोपी के कृत्य को अदालत ने स्पष्ट तौर पर ब्लैकमेलिंग बताया। शिकायतकर्ता ने परिचित पुरुष से कर्ज लिया जिसे नौकरी प्राप्त होने के बाद चुकाने का वादा था। इस दरम्यान दोनों में नजदीकियां बढ़ती गई और वे वाह्ट्सएप पर बातें करने लगे। वीडियो कॉल के दौरान वह जो कहता, महिला वही करती। प्रेमालाप के दौरान दोषी ने उसे बरगला कर कपड़े उतरवाए और नग्न वीडियो बना लिया। बाद में वीडियो को वायरल करने की धमकी देकर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। अनबन होने पर दोषी ने यह वीडियो उसके पैतृक गांव के कुछ लोगों व सोशल मीडिया पर पोस्ट कर उसे बदनाम करना शुरू कर दिया। उसका कहना है कि कर्ज की राशि प्राप्त न होने के कारण उसने यह कदम उठाया। चूंकि मामले में महिला मासूम नहीं है। वह विवाहित और परिपक्व है। भावावेशवश, लाभ के लोभ में, मजबूरन या ब्लैकमेलिंग के चलते जो कुछ करने को वह राजी हुई, उस पर अपने धन की वसूली के नाम पर दोषी ने जो तरीका इख्तियार किया वह किसी स्त्री की गरिमा, निजता और अधिकारों पर अतिक्रमण है। हालांकि महिलाओं को सहमति से संबंध बनाने के बावजूद इतना सतर्क और दूरदर्शितापूर्ण निर्णय लेने से नहीं चूकना चाहिए जो विपरीत स्थितियों में उनके खिलाफ हथियार के तौर पर प्रयोग किया जा सके। पूर्व प्रेमियों के ऐसे दुव्र्यहार की शिकार लड़कियां अमूमन ब्लैकमेलिंग की शिकायतें करने से भी घबराती हैं। पुरुषों द्वारा अंतरंग संबंधों या नग्न तस्वीरों को हथियार की तरह प्रयोग के प्रति महिलाओं को जागरूक रहना होगा। अपनी सामाजिक-पारिवारिक व्यवस्था में महिलाओं को झूठी शान व इज्जत के नाम पर तरह-तरह से शोषित किया जाता है। अमूमन पीडि़ताएं इस विषम स्थिति से घबरा कर अपना जीवन ही समाप्त कर लेती हैं। अदालत की सख्त टिप्पणी और कड़ी सजा के जरिए दोषियों को भी सीख दी जानी जरूरी है ताकि वे सहमति से बने संबंधों की गोपनीयता को हथियार बना कर अपने ही हाथ जलाने का जोखिम लेने से घबराएं।






