संदीप पंडा
प्रयागराज में हुई दुर्घटना ने विपक्ष को मानों अवसर सा प्रदान कर दिया है, लेकिन सवाल तो यह है कि इसका जिम्मेदार कौन है ? इसकी जवाबदेही किस पर डालनी चाहिए ? यदि हम विपक्ष के रवैया को देखे तो सारा दारमदार शासन व प्रशासन पर ही उठता नजर आ रहा है लेकिन सारा मांजरा ही उलट है यदि इस दुर्घटना में शासन व प्रशासन को केवल जिम्मेदार ठहराया जाये तो ये अपने आप में बेईमानी साबित होगा। प्रयागराज का वह संगम बिन्दु जहां हर किसी को ब्रम्हमुहूर्त में स्नान करना था जो कि किसी भी अवस्था मुमकिन नहीं था चंूकि दुर्घटना के समय प्रयागराज में लगभग 5 से 6 करोंड तक श्रद्धालू उपस्थित थे साथ ही संगम नोज के आसपास लगभग 25 लाख श्रद्धालू उपस्थित थे। शासन व प्रशासन द्वारा इतनी भीड़ देखते हुए लगातार अलाउंसमेंट किया जा रहा था कि सभी श्रद्धालू संगम जाने से बचे अर्थात संगम नोज के अलावा अतिरिक्त घाटों में स्नान करें। इसके बावजूद लाखों की भीड ने बैरिकेट तोडते हुए संगम नोज के आस पास सो रहें श्रद्धालुओं को कुचलते हुए संगम की ओर दौड लगाई मानों जैसे की स्नान नहीं दौड़ स्पर्धा में फस्र्ट आने की होड़ हो रही हो जिन्हें किसी की मृत्यु का भय ना होते हुए सर्वप्रथम स्नान करने की लालसा थी जिनके कारण लगभग 90 से अधिक श्रद्धालू घायल हो गये तो वहीं 30 श्रद्धालुओं को जान तक गवानी पड़ी। हालांकि दुर्घटना के कुछ कारणों में यह भी कारण है कि यदि संगम स्थल में आने जाने वाले रास्तों को अलग अलग एवं बैरिकेटों को मजबूती से स्थापित किया जाता तो शायद काफी हद तक ये हादसा रोका जा सकता था। साथ ही श्रद्धालुओं द्वारा श्रद्धा के साथ साथ धैर्य होता तो भी इस हादसे को रोका जा सकता था। यदि हम आप जैसे श्रद्धालुओं में धैर्य करने की क्षमता होती तो बैरीकेटों को तोडा ना जाता और ना ही यह दुर्घटना होती। इसलिये इस हादसे को एक पहलू से नहीं देखा जाना चाहिए। साथ ही यदि विपक्ष ऐसी दुर्घटनाओं को राजनीति के चश्में से देखता है तो भी यह बहुत दुख की बात है, दुर्घटना के चंद घंटों में विपक्षी पार्टियों द्वारा एक पर एक दागे जा रहे सवालों एवं भ्रामक मैसेजों ने यह जरूर साबित कर दिया है कि राजनीति के आगे मृत्यु की कोई कीमत नहीं है। हालांकि शासन प्रशासन ने चंद घंटों में ही अपनी मुस्तैदी से स्थिति को सामान्य कर दिया। जानकारी यह भी थी कि यदि प्रयागराज जाने वालें अन्य श्रद्धालुओं को रास्ते में ही नहीं रोका जाता तो प्रयागराज पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की संख्या दस करोड के पार तक जा सकती थीै जिसे संभालना अत्यंत मुश्किल भरा हो सकता था। यदि आप हम ऐसे किसी धार्मिक स्थलों पर जाये तो श्रद्धा के साथ साथ धैर्यवान भी बनना सीखे जिससे हम अपनी जान के साथ साथ दूसरों की जान को बचा सके। आपके कुछ मामूली घंटों की कीमत किसी की मृत्यु से ना चुकानी पड़े।






