भ्रष्टाचार की दुर्गंध महसूस

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समझा जा सकता है कि पब्लिक- प्राइवेट पार्टनरशिप के आधार पर बनीं सडक़ों का कैसा अनुचित बोझ सडक़ यूजर्स पर डाला गया गया है। अगर अतार्किक फॉर्मूले को अधिकारियों ने मंजूरी दी, तो क्या इसमें भ्रष्टाचार की दुर्गंध महसूस नहीं की जानी चाहिए? दिल्ली- नोएडा डायरेक्ट (डीएनडी) मार्ग पर टॉल वसूली में घपले पर सीएजी की रिपोर्ट और उस आधार पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला एक मिसाल है। ऐसे मामले देश में कहां-कहां और कितनी संख्या में होंगे, इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है। इस मार्ग पर प्राइवेट फर्म- नोएडा टॉल ब्रिज कंपनी लिमिटेड (एनटीबीसीएल) के टॉल वसूलने पर 2016 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रोक लगाई थी। इसके पहले सीएजी रिपोर्ट से टॉल तय करने में बड़ी गड़बड़ी का खुलासा हुआ था। बीते हफ्ते सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। उसने एनटीबीसीएल के साथ-साथ नोएडा प्रशासन के खिलाफ भी कड़ी टिप्पणियां कीं। सुप्रीम कोर्ट ने जिन गड़बडिय़ों की ओर ध्यान दिलाया, उनमें शामिल है: एनटीबीसीएल ने अपने अधिकारियों की अत्य़धिक तनख्वाह, भत्तों आदि को पुल निर्माण लागत में जोड़ा। इसके अलावा11 करोड़ रु. लीगल खर्च, चार करोड़ रु. यात्रा खर्च, और 33 करोड़ के डीप डिस्काउंट बॉन्ड देने पर हुआ खर्च भी इसमें शामिल किया गया। कॉरपोरेट गिफ्ट्स की खरीदारी के एवज में हुए सवा 72 लाख रुपये के खर्च को भी जोड़ा गया। इन सबसे बताई गई लागत रकम बढ़ती चली गई।और इस आधार पर टॉल तय हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने टॉल तय करने के इस फॉर्मूले को सिरे से अतार्किक बताया और इस आधार पर एनबीटीसीएल को अनिश्चित काल तक टॉल वसूलने की मंजूरी देने वाले अधिकारियों की गैर-जिम्मेदारी की आलोचना की। तो अब समझा जा सकता है कि पब्लिक- प्राइवेट पार्टनरशिप के आधार पर बनाई गईं और बन रहीं सडक़ों का कैसा अनुचित बोझ सडक़ यूजर्स पर डाला गया गया है। अगर अतार्किक फॉर्मूले को अधिकारियों ने मंजूरी दी, तो क्या इसमें भ्रष्टाचार की दुर्गंध महसूस नहीं की जानी चाहिए? अनुमान लगाया जा सकता है कि सार्वजनिक इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाने के इस चलन में राजनेता, ठेकेदार, अधिकारी और प्राइवेट कंपनियों- सबका फायदा है। नुकसान केवल आम यूजर उठा रहे हैं। उल्लेखनीय है कि अब कई शहरों में दोपहिया वाहन चालकों से भी टॉल टैक्स वसूला जा रहा है। तो क्या अब वक्त नहीं आ गया है कि इस पूरे मॉडल पर सवाल खड़े किए जाएं?

 

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