भगवान राम का यश ही भरत जी का यश है, और भरत जी का चरित्र ही भगवान राम का यश है, इसको साधक तब तक नहीं समझ पायेगा, तब तक वह स्वयं अपने मन को साफ़ नहीं कर लेता है। उपरोक्त उद्गार भरत सरिस को राम सनेही प्रवचन माला में पं. उमाशंकर शर्मा जी “व्यास” ने महेश भवन गोपालबाग में रामायणम जबलपुर द्वारा आयोजित श्री राम चरित मानस परायण ज्ञान यज्ञ के चतुर्थ दिवस व्यक्त किये।
महाराज जी ने बताया कि एक विचित्र बात रामायण में आती है कि जितने बुरे पात्र हैं, उन सबको किसी न किसी देवी-देवता का वरदान प्राप्त है, चाहे मेघनाथ हो, चाहे रावण हो, चाहे कुंभकर्ण हो, सबको वरदान मिला और जबकि दूसरी तरफ नारद ने विष्णु भगवान को शाप दे दिया, हनुमान को ऋषियों ने शाप दे दिया, नल-नील को ऋषियों ने शाप दे दिया, लेकिन बात बिल्कुल उल्टी हो गई। जिनको वरदान मिला, उनकी तो गिनती दुष्टों में हो गई और जिनको शाप मिला, उनकी पूजा होने लगी। यही जीवन की कला है। कई लोग वरदान को भी शाप बना लेते हैं और कई लोग कला में इतने निपुण होते हैं कि शाप को भी वरदान बना लेते हैं।
महाराज जी ने बतलाया कि आसक्ति क्या है? अयोध्या में आसक्ति मंथरा ने जगाई जब तक भरत जी अयोध्या में थे तब तक केकई राम जी के साथ थी। जैसे ही मंथरा आयी मन में आसक्ति उत्पन्न हो गई आशय यही है कि जब तक भरत रूपी भक्त की संगति रहेगी तब तक भगवान में मन लगा रहेगा और जैसे ही मंथरा रूपी आसक्ति आएगी भगवान से भी आसक्ति हो जाएगी।
महाराज जी ने कहा कि जिनके थोड़े से आनंद से बाकी लोग आनंदित हो जाये वही राम है। आनंद तो आप का स्वरुप है प्रकट होने के माध्यम अलग-अलग है। किसी को भोजन में, किसी को पूजन में, किसी को जप में, सबके माध्यम तो अलग है, जहा अपेक्षा समाप्त होगी, आनंद वही से आएगा। आनंद की अनुभूति भी होती है और भ्रांति भी। राम नाम से ही आनंद की उत्पत्ति होती है। जो सबको साथ लेकर चले, जो सब का भरण-पोषण करें उसी का नाम भरत है।
श्री राम सरकार एवं महाराज श्री का पूजन सर्व श्री मेवालाल छिरोलया, अभिलाष पांडेय, केदारनाथ शर्मा, अशोक मनोध्या, शरद दुबे, लोकराम कोरी, राजेश नेमा, जनार्दन शुक्ला, पी सी चांडक, मुरली मनोहर पचौरी, बासुदेव सावल खत्री, डॉ गोविंद नेमा, हिमांशु पटवा, शुभांक यादव, महादेव पचौरी, मुन्ना महाराज, अखिलेश त्रिपाठी, गोपाल खजांची, ने किया। मंच संचालन आचार्य डॉ. हरिशंकर दुबे एवं स्वस्तिवाचन पंडित रोहित दुबे, पं. सौरभ दुबे, पं. महेंद्र पांडेय, पं. पवन आदि ने किया।








