लोकतंत्र की व्यथा और दुर्दशा

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राजनीतिक दल अब देश और जनहित को पीछे छोडक़र केवल अपनी सत्ता और राजनीतिक लाभ को सर्वोपरि रखने लगे हैं। वैचारिक बहस और विकास के मुद्दों पर बात करने के बजाय, चुनाव अब भावनाएँ भडक़ाने, ध्रुवीकरण और मुफ्त की रेवडिय़ाँ बाँटने तक सीमित हो गए हैं। लोकतंत्र किसी देश की शासन व्यवस्था मात्र नहीं, बल्कि जनता की आकांक्षाओं, स्वतंत्रता, समानता और न्याय का जीवंत प्रतिबिंब होता है। इसकी वास्तविक शक्ति राजनीतिक दलों की संख्या में नहीं, बल्कि उनकी विचारधारा, जनसेवा के प्रति प्रतिबद्धता और लोकतांत्रिक मूल्यों के पालन में निहित होती है। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में अनेक राजनीतिक दलों का होना स्वाभाविक है। यहाँ भाषा, संस्कृति, क्षेत्र, सामाजिक संरचना और आर्थिक परिस्थितियों की विविधता है। इसलिए विभिन्न वर्गों की आकांक्षाओं को स्वर देने के लिए अनेक दलों की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता। किंतु जब राजनीतिक दलों की संख्या बढऩे के साथ जनहित के प्रश्न पीछे छूटने लगें, विचारधारा की जगह अवसरवाद ले ले और राजनीति का मूल उद्देश्य जनसेवा के बजाय सत्ता प्राप्त करना बन जाए, तब लोकतंत्र की स्थिति की समीक्षा आवश्यक हो जाती है। आज प्रश्न यह नहीं है कि देश में कितने राजनीतिक दल हैं, बल्कि यह है कि वे लोकतंत्र को कितना मजबूत बना रहे हैं और आम नागरिक के जीवन में कितना सकारात्मक परिवर्तन ला रहे हैं। भारतीय लोकतंत्र ने स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद अनेक उतार-चढ़ाव देखे हैं। संविधान ने प्रत्येक वयस्क नागरिक को मतदान का अधिकार देकर उसे शासन व्यवस्था में भागीदारी का अवसर दिया। यह अधिकार केवल सरकार चुनने का माध्यम नहीं, बल्कि अपनी आकांक्षाओं और असहमति को व्यक्त करने की शक्ति भी है। अब्राहम लिंकन ने लोकतंत्र को च्च्जनता का, जनता के द्वारा और जनता के लिए शासनज्ज् के रूप में परिभाषित किया था। इस विचार में लोकतंत्र की संपूर्ण आत्मा समाहित है। यदि शासन जनता के नाम पर चले, लेकिन उसकी प्राथमिकताओं में जनता की समस्याएँ ही शामिल न हों, तो लोकतंत्र का बाहरी स्वरूप भले सुरक्षित रहे, उसकी आत्मा कमजोर होने लगती है। जनता को केवल चुनाव के समय याद करना और उसके बाद उसकी कठिनाइयों से विमुख हो जाना जनतांत्रिक भावना के विपरीत है।
डॉ. भीमराव आंबेडकर ने संविधान सभा में 25 नवंबर 1949 को दिए अपने ऐतिहासिक भाषण में स्पष्ट चेतावनी दी थी कि हमें केवल राजनीतिक लोकतंत्र से संतुष्ट नहीं होना चाहिए, बल्कि राजनीतिक लोकतंत्र को सामाजिक लोकतंत्र भी बनाना होगा। उन्होंने स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को सामाजिक लोकतंत्र के आधारभूत सिद्धांत बताया था। उनका यह कथन आज भी राजनीतिक दलों के लिए आत्ममंथन का अवसर है।

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