अंकिता भंडारी मामले में कांग्रेस के विरोध प्रदर्शन पर दलित संगठनों में आक्रोश

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अंबेडकरवादी और कर्मचारी संगठनों ने कांग्रेस पर तीखा हमला बोला, देशभर से खुले पत्र – कहा, सामाजिक न्याय को राजनीतिक हथियार मत बनाओ
नई दिल्ली (आरएनएस) । नई दिल्ली। अंकिता भंडारी मामले को लेकर कांग्रेस नेतृत्व की ओर से इंडिया गेट पर किए गए विरोध प्रदर्शन पर देश के विभिन्न हिस्सों के चार दलित, आंबेडकरवादी और कर्मचारी संगठनों ने सवाल उठाए हैं। इन संगठनों ने कांग्रेस नेतृत्व को खुले पत्र लिखकर पार्टी पर राजनीतिक अवसरवाद और चयनात्मक सामाजिक न्याय का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि सामाजिक न्याय और संवैधानिक नैतिकता के सिद्धांतों का पालन सभी मामलों में समान रूप से होना चाहिए, न कि राजनीतिक परिस्थितियों और सुविधा के अनुसार।
कांग्रेस नेतृत्व को पत्र लिखने वाले संगठनों में सेल अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति कर्मचारी महासंघ, कर्मचारी कल्याण संघ (पंजीकृत), तेलंगाना का अनुसूचित जाति हक्कुला पोराटा संगम और हैदराबाद का डॉ. बी.आर. अंबेडकर वॉलीबॉल क्लब शामिल हैं। इन संगठनों की ओर से 15 अक्टूबर 2026 के आसपास लिखे गए पत्रों में लगभग समान चिंताएं व्यक्त की गई हैं। पत्रों का मुख्य विषय कांग्रेस का राजनीतिक अवसरवाद और चयनात्मक सामाजिक न्याय है।
संगठनों का कहना है कि अंकिता भंडारी मामले में कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के इंडिया गेट पर प्रदर्शन करने से यह मुद्दा राष्ट्रीय राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गया है। हालांकि, उनकी आपत्ति लोकतांत्रिक विरोध करने के अधिकार पर नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और संवैधानिक सिद्धांतों के कथित चयनात्मक इस्तेमाल पर है।
सेल अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति कर्मचारी महासंघ ने अपने पत्र में कहा है कि संवैधानिक नैतिकता की बात करने वाली कांग्रेस को अपने आचरण में भी निरंतरता दिखानी चाहिए। संगठन के अनुसार, सामाजिक न्याय तभी सार्थक हो सकता है, जब उसका इस्तेमाल पक्षपातपूर्ण हितों को साधने के लिए न किया जाए।
वहीं, कर्मचारी कल्याण संघ के अध्यक्ष एस.के. सोनी और महासचिव मनोज कुमार ने अपने पत्र में कहा कि कांग्रेस के हस्तक्षेप से उसकी संवैधानिक नैतिकता के प्रति प्रतिबद्धता को लेकर सवाल उठते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी आपत्ति विरोध प्रदर्शन करने से नहीं, बल्कि सिद्धांतों को चुनिंदा परिस्थितियों में लागू करने की प्रवृत्ति से है।
तेलंगाना के अनुसूचित जाति हक्कुला पोराटा संगम के संस्थापक अध्यक्ष मरेदु मोहन और हैदराबाद के डॉ. बी.आर. अंबेडकर वॉलीबॉल क्लब के अध्यक्ष ए. कांति किरण ने भी अपने पत्रों में इसी तरह की चिंताएं व्यक्त की हैं।संगठनों ने कहा कि दलित समुदाय के लिए कानून के समक्ष समानता, संस्थागत जवाबदेही और सामाजिक न्याय केवल राजनीतिक नारे नहीं, बल्कि लंबे संघर्षों से हासिल किए गए मूलभूत आदर्श हैं। आंबेडकरवादी आंदोलनों की कई पीढिय़ों ने इन मूल्यों को स्थापित करने के लिए संघर्ष किया है। इसलिए इन्हें राजनीतिक सुविधा के अनुरूप इस्तेमाल की जाने वाली शब्दावली तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए।
चारों संगठनों ने अपने पत्रों में कहा कि डॉ. बी.आर. अंबेडकर की विरासत को आगे बढ़ाने के लिए केवल संविधान का उल्लेख करना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए बौद्धिक ईमानदारी, सैद्धांतिक आचरण और जवाबदेही के समान मानकों का पालन करना भी आवश्यक है।
पत्रों के अंत में कांग्रेस नेतृत्व से आत्ममंथन करने की अपील की गई है। संगठनों ने कहा कि सामाजिक न्याय चयनात्मक नहीं हो सकता और संवैधानिक नैतिकता को सुविधानुसार नहीं अपनाया जा सकता। बाबासाहेब अंबेडकर की विरासत को भी पक्षपातपूर्ण राजनीतिक औजार के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।
संगठनों के मुताबिक, देश को ऐसी राजनीति की आवश्यकता है, जो निरंतर सिद्धांतों, संस्थागत जिम्मेदारी और समानता के प्रति वास्तविक प्रतिबद्धता पर आधारित हो। उनके अनुसार, सामाजिक न्याय के मुद्दों पर प्रतिक्रिया राजनीतिक सुविधा के बजाय समान मानदंडों और सिद्धांतों के आधार पर होनी चाहिए।

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