लेखक: प्रो. (डॉ.) मनमोहन प्रकाश
सनातन संस्कृति में नवरात्रि केवल कर्मकांड या अनुष्ठान नहीं, बल्कि शक्ति, साहस, स्वाभिमान और सृजनशीलता का महापर्व है। नौ दिनों तक माँ दुर्गा के नौ रूपों की आराधना होती है। देवालयों में घटस्थापना होती है, अखंड दीप प्रज्वलित होते हैं, वैदिक मंत्रों और हवन की आहुतियों से वातावरण गुंजायमान होता है तथा भव्य पंडालों में आस्था का सागर हिलोरें लेता है। किंतु इस उत्सवमयी वातावरण के बीच एक यक्ष प्रश्न हमारे अंतर्मन को मथता है—क्या देवी के सम्मुख नतमस्तक होने वाला हमारा समाज अपने आसपास की जीवित नारी(स्त्री) की शक्ति, स्वतंत्रता और अस्मिता को भी उतनी ही सहजता से स्वीकार करता है?
मेरा ऐसा मानना है कि शक्ति की सच्ची उपासना केवल देवी की प्रतिमा के सामने शीश झुकाना नहीं, बल्कि नारी के आत्मसम्मान, स्वतंत्रता और समान अधिकारों को जीवन में प्रतिष्ठित करना है। माँ दुर्गा का तेज हमें अन्याय के विरुद्ध निर्भीक संघर्ष और अधर्म के उन्मूलन का संदेश देता है। वे केवल पूजनीय प्रतिमा नहीं, बल्कि उस अदम्य सामथ्र्य की प्रतीक हैं, जो भीषण संकटों में भी पराजय स्वीकार नहीं करता। विडंबना यह है कि भारतीय संस्कृति में नारी को देवी का स्थान दिया गया, फिर भी उसी देश के विभिन्न समाज में आज भी उसकी सुरक्षा, शिक्षा, समान अवसर, स्वायत्तता और गरिमा से जुड़े प्रश्न गंभीर चुनौती बने हुए हैं। एक ओर हम नवरात्रि में कन्याओं के चरण पूजते हैं, तो दूसरी ओर आज भी अनेक बेटियाँ तरह तरह के अपराधों का शिकार हो रही है तथा भेदभाव, सामाजिक कुरीतियों और असुरक्षा के साये में जीने को विवश हैं। यह विरोधाभास हमारी सामाजिक चेतना के सामने एक बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। क्या हमारी भक्ति तीज-त्योहारों और धार्मिक आयोजनों तक सीमित रह गई है? क्या हमने धर्म के बाहरी प्रतीकों को तो अपना लिया, लेकिन उसके मूल संदेश को आचरण में उतारना भूल गए? नारी-सम्मान का वास्तविक अर्थ केवल औपचारिक प्रशंसा करना या विशेष अवसरों पर देवी के चरणों में पुष्प अर्पित करना नहीं है। सच्चा सम्मान तब प्रकट होता है, जब परिवार में बेटी को बेटे के समान शिक्षा और संसाधनों के अवसर मिलें,बहू को बेटी का दर्जा प्राप्त हो।बेटी हो या बहू उसके निर्णयों का आदर हो तथा उसके सपनों और आकांक्षाओं को पंख मिलें। कार्यस्थल पर हर नारी की प्रतिभा को निष्पक्ष पहचान मिले, और सार्वजनिक स्थलों पर वह भयमुक्त होकर आ-जा सके। जब ये स्थितियाँ जीवन का सहज हिस्सा बनेंगी, तभी शक्ति-पूजा अपने वास्तविक अर्थ को प्राप्त करेगी। आज की नारी घर की सीमाओं से आगे बढक़र विज्ञान, तकनीक, अंतरिक्ष, प्रशासन, सैन्य बल, खेल, राजनीति और उद्यमिता के क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा का परचम लहरा रही है।
वह केवल परिवार की धुरी नहीं, बल्कि राष्ट्र-निर्माण की महत्त्वपूर्ण भागीदार भी है। अब उसे अबला मानकर संरक्षण देने की मानसिकता से आगे बढऩे और उसकी क्षमताओं पर विश्वास करते हुए समान अवसर उपलब्ध कराने की आवश्यकता है। नारी-सशक्तीकरण कोई उपकार नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण और समतामूलक समाज की अनिवार्य शर्त है। इस परिवर्तन की यात्रा में परिवार, पुरुषों और सामाजिक संस्थाओं की भूमिका निर्णायक है। बेटों को बचपन से ही महिलाओं के प्रति सम्मान, संवेदनशीलता और समानता का भाव सिखाना होगा। घरेलू कार्यों को केवल स्त्रियों का दायित्व मानने वाली पारंपरिक सोच बदलनी होगी। महिलाओं के प्रति अनुचित टिप्पणियों, सूक्ष्म भेदभाव, उत्पीडऩ और हिंसा के प्रति शून्य सहनशीलता का दृष्टिकोण अपनाना होगा।कानून का पालन अपनी जगह आवश्यक है, किंतु स्थायी परिवर्तन केवल कानून से नहीं आता। उसके लिए संवेदनशील चेतना, जिम्मेदार व्यवहार और समानता पर आधारित संस्कार भी जरूरी हैं। जब सम्मान परिवार की सीख और समाज की सहज प्रवृत्ति बन जाएगा, तभी परिवर्तन की नींव मजबूत होगी।
नवरात्रि हमें स्मरण कराती है कि अन्याय कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, साहस, सत्य और संकल्प के सामने उसका पराभव संभव है। आज का ‘महिषासुर’ केवल पौराणिक कथा का पात्र नहीं, बल्कि उस हर रूढि़वादी सोच का प्रतीक है, जो स्त्री को कमजोर समझती है, उसके अधिकारों का हनन करती है, उसकी गरिमा को ठेस पहुँचाती है या उसके विरुद्ध हिंसा और यौन अपराधों को जन्म देती है। इस मानसिकता का संहार किसी एक पर्व से नहीं, बल्कि निरंतर आत्ममंथन, सामाजिक जागरूकता और दृढ़ संकल्प से ही संभव है। मेरे विचार में नवरात्रि के अनुष्ठान और दीपों की पंक्तियाँ तभी सार्थक होंगी, जब वे हमारे भीतर के संवेदनहीनता के अंधकार को दूर करेंगी। माँ आदिशक्ति के चरणों में चढ़ाया गया प्रत्येक पुष्प तभी सार्थक होगा, जब हमारे व्यवहार में सम्मान, विचारों में समानता और कर्मों में न्याय का भाव दिखाई देगा।अत: इस नवरात्रि केवल मंदिरों में शक्ति का आह्वान न करें, बल्कि अपने घर और समाज में विद्यमान शक्ति के प्रत्येक स्वरूप—हर बेटी, हर बहन, हर माँ और हर स्त्री—के सम्मान, स्वतंत्रता और स्वाभिमान की रक्षा का संकल्प लें। क्योंकि शक्ति की उपासना का सर्वोच्च शिखर किसी देवालय में नहीं, बल्कि नारी के सम्मान, समानता और गरिमा से परिपूर्ण समाज के निर्माण में है।






