नई दिल्ली,(आरएनएस)। राष्ट्रीय विधि अध्ययन एवं अनुसंधान अकादमी (नालसार) विश्वविद्यालय से जुड़े विवाद में सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय बार काउंसिल को कड़ी फटकार लगाते हुए स्पष्ट किया है कि उसके पास विधि छात्रों के आचरण को नियंत्रित करने या उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है। न्यायालय ने कहा कि विधि छात्रों के खिलाफ किसी भी तरह की अनुशासनात्मक कार्रवाई का अधिकार उस शैक्षणिक संस्थान के पास है, जहां छात्र नामांकित हैं।
न्यायमूर्ति की पीठ ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि जब तक कोई विधि छात्र अधिवक्ता के रूप में पंजीकृत नहीं हो जाता, तब तक बार काउंसिल उसके खिलाफ अपने नियमों के तहत कार्रवाई नहीं कर सकती। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि भारतीय बार काउंसिल के पास विधि शिक्षा प्राप्त कर रहे छात्रों को अनुशासित करने का कोई वैधानिक अधिकार या दायित्व नहीं है। बार काउंसिल विधि विश्वविद्यालयों को यह निर्देश भी नहीं दे सकती कि वे अपने छात्रों के आचरण से किस प्रकार निपटें।अदालत के अनुसार, छात्रों पर अनुशासनात्मक नियंत्रण पूरी तरह संबंधित विश्वविद्यालय या शैक्षणिक संस्थान के अधिकार क्षेत्र में आता है। बार काउंसिल की भूमिका तब शुरू होती है जब कोई विधि स्नातक अधिवक्ता के रूप में पंजीकृत हो जाता है। न्यायालय ने कहा कि अधिवक्ता अधिनियम, 1961 के तहत गठित भारतीय बार काउंसिल या किसी राज्य बार काउंसिल को विधि छात्रों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने की न तो स्पष्ट और न ही निहित शक्ति प्राप्त है।अदालत ने कहा कि ऐसी शक्ति तभी प्राप्त होती है, जब कोई विधि स्नातक संबंधित कानून के तहत अधिवक्ता के रूप में पंजीकृत हो जाता है। इसलिए छात्र जीवन के दौरान उनके आचरण के संबंध में कार्रवाई विश्वविद्यालय के नियमों के अनुसार ही की जानी चाहिए।
सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय बार काउंसिल की ओर से 13 अगस्त को जारी पत्र और नालसार विश्वविद्यालय के छात्रों के खिलाफ बाद में संशोधित किए गए सभी पत्रों को अधिकार क्षेत्र से बाहर जारी किया गया घोषित कर दिया।
अदालत ने अपने पहले के अंतरिम आदेश को भी लागू रखा, जिसके तहत भारतीय बार काउंसिल और राज्य बार परिषदों को नालसार के छात्रों के खिलाफ किसी भी दंडात्मक या आपराधिक कार्रवाई से रोका गया था।
दरअसल, हैदराबाद स्थित नालसार विश्वविद्यालय के छात्रों ने दीक्षांत समारोह में भारत के मुख्य न्यायाधीश को मुख्य अतिथि बनाए जाने का विरोध किया था। छात्रों के इस विरोध के बाद भारतीय बार काउंसिल ने विश्वविद्यालय के वर्ष 2026 के विद्यार्थियों के अधिवक्ता के रूप में पंजीकरण पर रोक लगाने का आदेश जारी किया था।
इस फैसले को लेकर व्यापक आलोचना हुई थी। इसके बाद बार काउंसिल ने अपना आदेश वापस ले लिया था। उसके अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा ने भी छात्रों से माफी मांगी थी।
नालसार विवाद की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने इससे एक दिन पहले भारतीय बार काउंसिल के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा के कार्यकाल को लेकर भी सवाल उठाए थे। इसके बाद अब न्यायालय ने विधि छात्रों के खिलाफ बार काउंसिल की कार्रवाई के अधिकार क्षेत्र को लेकर स्पष्ट फैसला सुनाया है।
सर्वोच्च न्यायालय की इस टिप्पणी से यह स्पष्ट हो गया है कि विधि विश्वविद्यालयों में पढऩे वाले छात्रों के अनुशासन और उनके आचरण से जुड़े मामलों में प्राथमिक अधिकार संबंधित शैक्षणिक संस्थान का ही होगा।
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