बिना ओटीपी निजी कंपनियों की संवेदनशील जानकारी तक पहुंच का आरोप, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को चार महीने में कार्रवाई के निर्देश

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नई दिल्ली(आरएनएस)। क्या किसी व्यक्ति की सहमति और बिना किसी एकमुश्त पासवर्ड के निजी कंपनियां उसके कर्मचारी भविष्य निधि खाते, विशिष्ट खाता संख्या और स्थायी खाता संख्या से जुड़ी संवेदनशील जानकारी तक पहुंच सकती हैं या उसका व्यावसायिक इस्तेमाल कर सकती हैं? इस गंभीर सवाल पर उच्चतम न्यायालय ने संज्ञान लिया है। न्यायालय ने केंद्र सरकार को निजी सत्यापन कंपनियों द्वारा कर्मचारी भविष्य निधि संगठन और विशिष्ट खाता संख्या तथा स्थायी खाता संख्या से जुड़े रोजगार एवं वित्तीय आंकड़ों के कथित अनधिकृत इस्तेमाल और व्यावसायिक शोषण के आरोपों पर गंभीरता से विचार करने का निर्देश दिया है।मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने केंद्र सरकार को इस संबंध में दाखिल विस्तृत आवेदन पर विचार करने और आवश्यक कदम उठाने के लिए अधिमानत: चार महीने की समयसीमा तय की है। हालांकि, न्यायालय ने फिलहाल ऐसे डेटा के इस्तेमाल पर तत्काल रोक लगाने का आदेश नहीं दिया है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने जनहित याचिका पर सुनवाई की। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रुचि कोहली ने पक्ष रखा।
याचिका में मांग की गई थी कि कर्मचारी भविष्य निधि संगठन की विशिष्ट खाता संख्या से जुड़े रोजगार संबंधी आंकड़ों तथा स्थायी खाता संख्या, आयकर विवरणी, प्रपत्र 26एएस और वार्षिक सूचना विवरण से जुड़े वित्तीय आंकड़ों को बिना अनुमति देखने, साझा करने, उजागर करने या किसी अन्य व्यक्ति अथवा संस्था को हस्तांतरित करने पर रोक लगाई जाए।
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि कुछ निजी जांच और रोजगार सत्यापन कंपनियां कर्मचारी भविष्य निधि खाते की विवरण पुस्तिका और प्रपत्र 26एएस से संबंधित आंकड़ा प्राप्ति तंत्र जैसी सेवाओं के जरिए लोगों की संवेदनशील जानकारी तक पहुंच बना रही हैं।
आरोप है कि कुछ मामलों में स्पष्ट सहमति या एकमुश्त पासवर्ड सत्यापन के बिना भी इस तरह के आंकड़े हासिल किए जा सकते हैं और उनका व्यावसायिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।
याचिका में यह भी दावा किया गया कि कुछ निजी सत्यापन प्रणालियों में केवल स्थायी खाता संख्या और विशिष्ट खाता संख्या जैसी जानकारी के आधार पर किसी व्यक्ति के रोजगार का विस्तृत इतिहास प्राप्त किया जा सकता है। यदि ऐसा बिना स्पष्ट सहमति और उचित सत्यापन के संभव है, तो यह व्यक्तिगत निजता और आंकड़ा सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता का विषय है।
याचिकाकर्ता ने कहा कि कर्मचारी भविष्य निधि संगठन और आयकर विभाग के पास नागरिकों के रोजगार और वित्तीय जीवन से जुड़ी अत्यंत संवेदनशील जानकारी मौजूद रहती है। इसमें नौकरी का इतिहास, भविष्य निधि संबंधी विवरण, आय, कर भुगतान और अन्य वित्तीय जानकारी शामिल हो सकती है।
ऐसे आंकड़ों का अनधिकृत उपयोग, साझा किया जाना या व्यावसायिक शोषण व्यक्ति की निजता के अधिकार को प्रभावित कर सकता है। इसी आधार पर याचिका में सरकारी आंकड़ों तक निजी संस्थाओं की पहुंच और उसमें मौजूद संभावित तकनीकी कमियों की जांच की मांग की गई।
जनहित याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14, अनुच्छेद 19(1)(जी) और अनुच्छेद 21 का हवाला दिया गया है। याचिकाकर्ता ने विशेष रूप से निजता के अधिकार और व्यक्तिगत जानकारी को गैरकानूनी तरीके से उजागर किए जाने से सुरक्षा की आवश्यकता पर जोर दिया।
याचिका में आरोप लगाया गया कि देश में रोजगार सत्यापन की ऐसी डिजिटल व्यवस्था विकसित हो रही है, जिसमें निजी कंपनियां व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए सरकारी संस्थाओं के पास उपलब्ध व्यक्तिगत आंकड़ों तक पहुंच हासिल कर सकती हैं और अलग-अलग स्रोतों से प्राप्त जानकारी का मिलान कर सकती हैं।
याचिकाकर्ता की ओर से इस संबंध में श्रम एवं रोजगार मंत्रालय, कर्मचारी भविष्य निधि संगठन, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, भारतीय कंप्यूटर आपातकालीन प्रतिक्रिया दल, वित्त मंत्रालय, आयकर विभाग और केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड समेत विभिन्न सरकारी संस्थाओं को शिकायतें और आवेदन भेजे गए थे।
इन संस्थाओं से यह जांच करने का अनुरोध किया गया था कि निजी संस्थाएं संवेदनशील रोजगार एवं वित्तीय आंकड़ों तक किस प्रकार पहुंच बना रही हैं और क्या संबंधित प्रणालियों में तकनीकी खामियां अथवा पर्याप्त सहमति तंत्र का अभाव है।
उच्चतम न्यायालय ने फिलहाल निजी सत्यापन कंपनियों के खिलाफ तत्काल रोक लगाने के बजाय केंद्र सरकार को याचिकाकर्ता की विस्तृत मांगों और शिकायतों पर विचार करने का निर्देश दिया है।
अदालत ने केंद्र सरकार से कर्मचारी भविष्य निधि संगठन और आयकर विभाग द्वारा एकत्र किए गए आंकड़ों के संभावित दुरुपयोग को रोकने के लिए आवश्यक कदम उठाने को कहा है। मामले में व्यापक निर्णय लेने के लिए चार महीने की समयसीमा को प्राथमिकता दी गई है।
उच्चतम न्यायालय के इस निर्देश के बाद सरकारी आंकड़ों की सुरक्षा, नागरिकों की डिजिटल निजता और निजी कंपनियों द्वारा संवेदनशील जानकारी के इस्तेमाल को लेकर बहस और तेज होने की संभावना है।
मामले का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि रोजगार सत्यापन के लिए इस्तेमाल होने वाली प्रणालियों में किसी व्यक्ति की नौकरी, आय और वित्तीय स्थिति से संबंधित जानकारी एक साथ उपलब्ध हो सकती है। अब केंद्र सरकार द्वारा की जाने वाली समीक्षा से यह स्पष्ट हो सकता है कि ऐसे आंकड़ों तक निजी संस्थाओं की पहुंच किन नियमों और सहमति प्रक्रियाओं के तहत होनी चाहिए तथा नागरिकों की संवेदनशील जानकारी के संभावित दुरुपयोग को रोकने के लिए क्या अतिरिक्त सुरक्षा उपाय जरूरी हैं।
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