नई दिल्ली (ए.)। दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने अदालत की आपराधिक अवमानना के मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए अरविंद केजरीवाल को नोटिस जारी किया है। अदालत ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई नहीं की गई, तो समाज में अराजकता फैल जाएगी। इस मामले में केजरीवाल के अलावा आम आदमी पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेताओं मनीष सिसोदिया, संजय सिंह और दुर्गेश पाठक के खिलाफ भी अवमानना की कार्रवाई की जाएगी। इस दौरान न्यायपालिका की गरिमा का जिक्र करते हुए कोर्ट ने एक बेहद अहम और कड़ी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि जब न्यायपालिका जैसी सर्वोच्च संस्था को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की जाती है, तो एक जज का यह सर्वोपरि दायित्व बन जाता है कि वह बिना किसी दबाव के काम करे और बदनामी की ऐसी कोशिशों से अपने फैसले को प्रभावित न होने दे। अदालत ने स्थिति को स्पष्ट करते हुए यह भी कहा कि जब जज को इस मामले की सुनवाई से अलग होने की याचिका पर विचार किया जा रहा था, तब कोर्ट को ऐसा लगा था कि यह मुद्दा केवल एक न्यायिक आदेश की वैधता और पक्षपात की आशंका तक ही सीमित है। इससे पहले, अदालत ने कहा था कि वह आम आदमी पार्टी के नेताओं अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और दुर्गेश पाठक का प्रतिनिधित्व करने के लिए तीन वरिष्ठ अधिवक्ताओं को एमिकस क्यूरी के रूप में नियुक्त करेगी। ये अधिवक्ता आबकारी नीति मामले में उनके पक्ष में पारित बरी करने के आदेश के खिलाफ सीबीआई की याचिका में शामिल होंगे। यह तब हुआ जब केजरीवाल, सिसोदिया और पाठक ने न्यायमूर्ति शर्मा को पत्र लिखकर कहा था कि आबकारी मामले की कार्यवाही में उनका कोई वकील नहीं होगा। केजरीवाल ने न्यायमूर्ति शर्मा को पत्र लिखकर कहा था कि वे न्यायाधीश के समक्ष लंबित कार्यवाही में भाग नहीं लेंगे। उन्होंने कहा कि न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता से न्याय मिलने की मेरी उम्मीद खत्म हो गई है। इसलिए मैंने महात्मा गांधी द्वारा दिखाए गए सत्याग्रह के मार्ग पर चलने का फैसला किया है। केजरीवाल के बाद सिसोदिया और पाठक ने भी न्यायमूर्ति शर्मा को पत्र लिखकर सूचित किया कि वे भी उनकी अदालत में बिना वकील के पेश होंगे। न्यायमूर्ति शर्मा ने इससे पहले सीबीआई की याचिका की सुनवाई से खुद को अलग करने से इनकार कर दिया था। न्यायाधीश शर्मा ने इस मामले से खुद को अलग करने की याचिका खारिज करते हुए कहा कि अगर मैं इन (खुद को अलग करने की) याचिकाओं को स्वीकार करती, तो यह एक चिंताजनक मिसाल कायम करता। उन्होंने यह भी कहा कि पक्षपात या भेदभाव का हर अप्रमाणित और निराधार आरोप न केवल किसी एक न्यायाधीश पर लगाया जाता है, बल्कि न्यायपालिका की सामूहिक अखंडता पर भी कलंक लगाता है। न्यायाधीश ने कहा कि जब भी जरूरत होगी, अदालत अपने और न्यायपालिका के लिए खड़ी होगी, भले ही यह मुश्किल लगे।








