नए लेबर कोड में अब नौकरी पर जब चाहे रखो और जब चाहे निकालो : खडग़े

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नई दिल्ली,(ए.)। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े ने देश में लागू हुए चार नए लेबर कोड पर आपत्ति जताते हुए इसे मजदूरों के हितों के लिए एक झटका बताया है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने बिना किसी सलाह के चार नए लेबर कोड लागू कर दिए। खडग़े ने एक बयान में कहा कि मोदी सरकार विधानसभा चुनाव खत्म होने का इंतजार करती रही। इसके बाद 8 और 9 मई 2026 को गजट अधिसूचना जारी कर चार मजदूर-विरोधी श्रम संहिताओं को लागू कर दिया।भारत के करोड़ों मजदूरों के लिए ये संहिताएं हायर एंड फायर की नीति ला रही हैं यानी नौकरी पर जब चाहे रख लो और जब चाहे निकाल दो। साथ ही ठेका पर रोजगार बढ़ेगा और ट्रेड यूनियन बनाने की गुंजाइश भी बहुत कम हो जाएगी।

उन्होंने कहा कि यह ध्यान रखना अहम है कि मोदी सरकार ने इन मजदूर-विरोधी संहिताओं का मसौदा तैयार किया और उन्हें बिना किसी परामर्श के लागू कर दिया। इसने 2015 के बाद से भारतीय श्रम सम्मेलन भी नहीं बुलाया। आजादी के बाद से मजदूरों के अधिकारों के लिए सबसे बड़ा झटका है।नए नियमों के तहत मूल वेतन कुल पारिश्रमिक का 50 फीसदी या उससे ज्यादा होना चाहिए। कर्मचारियों के लिए हाथ में आने वाले वेतन में भारी कमी देखने को मिलेगी। वेतन की एक जटिल और एकल परिभाषा ने वेतन संरचना को पूरी तरह से उलट दिया है, जिससे भत्ते कम हो गए और भारी भ्रम पैदा हो गया है। सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों पर अतिरिक्त लागतों और डिजिटल अनुपालन का नया बोझ उनके अस्तित्व के लिए एक चुनौती बन गया है। न्यूनतम वेतन सुरक्षा में कृषि मजदूरों और घरेलू सहायकों को शामिल नहीं किया गया है।
खडग़े ने व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य-दशा संहिता 2020 का जिक्र करते हुए कहा कि इस संहिता में कार्यस्थल पर सुरक्षा को नियोक्ता का अनिवार्य कर्तव्य मानने के बजाय, उसे सिर्फ व्यवसाय की एक अतिरिक्त खर्च बना दिया है। यह संहिता अपराध-मुक्तिकरण का ढांचा लाती है। सुरक्षा नियमों का उल्लंघन करने पर चाहे उससे गंभीर चोट या दुर्घटना ही क्यों न हो अब आपराधिक मुकदमा चलाने के बजाय सिर्फ जुर्माना भरने की व्यवस्था है। रात की शिफ्ट में काम करने वाली महिलाओं के लिए एस्कॉर्ट, ट्रांसपोर्ट और सीसीटीवी कवरेज जैसे सुरक्षा उपायों के लिए कोई ठोस, अनिवार्य मॉडल नहीं है। कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले मजदूरों के स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए नियोक्ता की जिम्मेदारी का कोई प्रावधान नहीं है।
खरगे ने कहा कि भारत के 90 फीसदी मजदूर जो असंगठित क्षेत्र में हैं, उनके लिए यह संहिता कागजी औपचारिकता से ज़्यादा कुछ नहीं, क्योंकि छोटे और सूक्ष्म उद्यमों को कुछ प्रावधानों से छूट मिली हुई है। गिग वर्कर के लिए फंडिंग, योगदान या बीमा का कोई स्पष्ट मॉडल नहीं है। उन्हें न तो कर्मचारी के तौर पर मान्यता दी गई है और न ही पूरी सुरक्षा दी गई है। लाभ के स्तर और समय-सीमा स्पष्ट नहीं हैं। निर्माण मज़दूरों और अन्य श्रेणियों के लिए कल्याण बोर्डों की भूमिका सीमित कर दी गई है, जिससे लाभों की पोर्टेबिलिटी रुक गई है। सामाजिक सुरक्षा को संवैधानिक अधिकार के बजाय डेटा एंट्री का काम बना दिया है। देश के 90 फीसदी मज़दूरों को पहचान पत्र दिया जा रहा है लेकिन उन्हें कोई कानूनी गारंटी या वास्तविक लाभ नहीं मिल रहे हैं।
खरगे ने कहा कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस भारत के मजदूरों के लिए अपने दृष्टिकोण पर अडिग है। हम अपने पांच-सूत्रीय श्रमिक न्याय एजेंडे के प्रति प्रतिबद्ध हैं।

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