इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कथित रेप केस के एक मामले में सुनवाई करते हुए एक बेहद अहम और बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका को मंजूर करते हुए साफ तौर पर कहा है कि सहमति से बालिगों के बीच लंबे समय तक चलने वाले शारीरिक संबंधों को ‘रेप’ के दायरे में नहीं रखा जा सकता। जस्टिस राजीव लोचन शुक्ला की सिंगल बेंच ने इस मामले में आरोपी को सशर्त अग्रिम जमानत दे दी है और उसे पुलिस की जांच में पूरा सहयोग करने का निर्देश दिया है।
सुप्रीम कोर्ट के नक्शेकदम पर हाई कोर्ट का फैसला
हाई कोर्ट का यह फैसला ऐसे समय में आया है जब कुछ ही दिन पहले देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) ने भी बिना शादी के साथ रह रहे जोड़ों (लिव-इन रिलेशनशिप) को लेकर बिल्कुल ऐसी ही बेबाक टिप्पणी की थी। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि यदि दो बालिगों के बीच सहमति से संबंध बने हैं और बाद में किसी वजह से वे दोनों अलग हो जाते हैं, तो इस स्थिति को रेप नहीं माना जा सकता।
शादी का झांसा और लिव-इन रिलेशनशिप का था पूरा मामला
सुप्रीम कोर्ट में जो मामला पहुंचा था, उसमें एक महिला ने अपने लिव-इन पार्टनर पर शादी का झूठा वादा कर रेप करने का गंभीर आरोप लगाया था। इस मामले में हैरान करने वाली बात यह थी कि दोनों काफी लंबे समय से एक साथ रह रहे थे और उनका एक बच्चा भी है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए खुद महिला पर ही सवाल खड़ा कर दिया था कि आखिर वह शादी से पहले आरोपी के साथ क्यों रहने लगी थी?
‘जब सहमति थी, तो अपराध का सवाल ही कहां उठता है?’
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बीवी नागरत्ना ने मामले की सुनवाई के दौरान साफ कहा था कि अगर संबंध सहमति से बना था और दोनों लंबे समय तक साथ रहे, तो रिश्ता टूटने के बाद इसे आपराधिक मामला नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने कहा कि लिव-इन रिलेशनशिप के मामलों में अक्सर ऐसा देखा जाता है कि रिश्ता खत्म होने पर महिला द्वारा रेप का आरोप लगा दिया जाता है, जबकि शुरुआत में ये संबंध पूरी तरह से सहमति से बने होते हैं।
‘हमें दूसरी महिलाओं से कोई मतलब नहीं’
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान जब महिला के वकील ने यह दलील दी कि उसे इस बात की भनक तक नहीं थी कि वह आदमी पहले से ही शादीशुदा है और उसकी चार पत्नियां हैं, तथा वह लगातार औरतों का शोषण कर रहा है। इस पर जस्टिस नागरत्ना ने दो टूक जवाब देते हुए कहा था, हमें दूसरी महिलाओं से कोई मतलब नहीं है। हमारी चिंता सिर्फ याचिकाकर्ता से है। जब रिश्ते में सहमति थी, तो फिर यहां अपराध का सवाल ही कहां उठता है? सुप्रीम कोर्ट की इसी तर्ज पर अब इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भी कड़ा रुख अपनाते हुए अपना यह अहम फैसला सुनाया है।








