दहेज देने की बात स्वीकार करने मात्र से पत्नी के परिवार पर नहीं चलेगा केस’, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

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सुप्रीम कोर्ट ने दहेज मामलों पर अहम टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि यदि पत्नी अपनी शिकायत में दहेज देने की बात लिखती है, तो केवल इसी आधार पर उसके या उसके परिवार के खिलाफ दहेज देने का मामला दर्ज नहीं किया जा सकता।
जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच ने पति की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें उसने दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3 के तहत पत्नी के परिवार के खिलाफ अलग से स्नढ्ढक्र दर्ज करने की मांग की थी।
पति का तर्क था कि पत्नी ने अपनी शिकायत में दहेज देने की बात स्वीकार की है, इसलिए यह अपराध बनता है। इस पर अदालत ने कहा कि अधिनियम की धारा 7(3) पीडि़तों को अभियोजन से संरक्षण देती है, ताकि वे बिना डर के अपनी शिकायत दर्ज करा सकें। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि दहेज देने के स्वतंत्र और ठोस सबूत मौजूद हों—जो केवल शिकायत या बयानों से अलग हों—तभी धारा 3 के तहत कार्रवाई संभव है।
गौरतलब है कि मूल रूप से धारा 3 में दहेज देने और लेने दोनों को समान रूप से दंडनीय माना गया था। हालांकि, 1982 में संयुक्त संसदीय समिति की रिपोर्ट के बाद इसमें महत्वपूर्ण संशोधन किए गए। समिति ने पाया था कि दहेज देने वाले अक्सर अपराधी नहीं, बल्कि सामाजिक दबाव के कारण मजबूर पीडि़त होते हैं। इस फैसले को दहेज पीडि़तों के लिए राहत और न्याय प्रक्रिया को अधिक संवेदनशील बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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