किसी व्यक्ति को महज ‘नीच’ जैसे सामान्य अपमानजनक शब्द कह देने से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम यानी एक्ट अपने आप लागू नहीं होता। जस्टिस वीरेन्द्र कुमार की पीठ ने यह व्यवस्था देते हुए कहा कि इस एक्ट के तहत मामला तभी बनता है, जब यह साबित हो जाए कि अपमान विशेष रूप से जाति के आधार पर किया गया था और आरोपी को पीडि़त की जाति की पूर्व जानकारी थी।
क्या था 2011 का आईआईटी जोधपुर विवाद
इस मामले की जड़ें वर्ष 2011 से जुड़ी हैं। घटना उस समय की है जब आईआईटी जोधपुर से जुड़े एक विवाद में सरकारी अधिकारी अतिक्रमण की जांच के लिए मौके पर पहुंचे थे। अधिकारियों की कार्रवाई के दौरान वहां मौजूद कुछ लोगों ने विरोध शुरू कर दिया। आरोप है कि विरोध के दौरान प्रदर्शनकारियों ने अधिकारियों के लिए ‘नीच’ और ‘भिखारी’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया। इसे जातिगत अपमान मानते हुए अधिकारियों ने पुलिस में एफआईआर दर्ज कराई थी, जिसमें स्ष्ट/स्ञ्ज एक्ट के साथ-साथ भारतीय दंड संहिता की धाराएं भी लगाई गई थीं।
आरोपियों की दलील और कोर्ट का तर्क
आरोपियों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर अपने ऊपर लगे आरोपों को चुनौती दी थी। उनकी दलील थी कि उन्हें संबंधित अधिकारियों की जाति के बारे में कोई जानकारी नहीं थी, इसलिए जानबूझकर जातिगत अपमान करने का सवाल ही नहीं उठता। उन्होंने यह भी कहा कि बोले गए शब्द किसी विशेष जाति का संकेत नहीं देते हैं और घटना के वक्त कोई स्वतंत्र गवाह भी मौजूद नहीं था।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि इस्तेमाल किए गए शब्द अपमानजनक हो सकते हैं, लेकिन वे किसी जाति विशेष की ओर इशारा नहीं करते। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि स्ष्ट/स्ञ्ज एक्ट की धाराओं को लागू करने के लिए जाति-आधारित अपमान का स्पष्ट और ठोस प्रमाण होना अनिवार्य है। महज सामान्य बहस में बोले गए शब्दों को जातिगत अत्याचार नहीं माना जा सकता।
एक्ट की धाराएं रद्द, लेकिन केस चलता रहेगा
तमाम दलीलों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने आरोपियों को बड़ी राहत देते हुए उनके खिलाफ लगाई गई एक्ट की धाराओं को रद्द कर दिया। कोर्ट ने माना कि यह मामला जातिगत भेदभाव का नहीं बनता है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि आरोपियों को पूरी तरह से बरी नहीं किया गया है। सरकारी कर्मचारियों को उनकी ड्यूटी करने से रोकने, धक्का-मुक्की करने और बाधा पहुंचाने से संबंधित आईपीसी की धाराओं के तहत मामला बरकरार रहेगा और निचली अदालत में इन्हीं आरोपों पर आगे की सुनवाई होगी।








