(रक्षाबंधन एक पवित्र पर्व)
बहनें अपनी भाइयों की कलाई में “ओम येन बद्धो बलि राजा दानवेंद्रो महाबल:,
तेन त्वामभी बंध्यनामी रक्षे मा चल मा चल का पवित्र पाठ करते हुए रक्षा सूत्र भाइयों की कलाई पर भाई के दीर्घजीवी होने की कल्पना करके बांधती हैं।भारत न सिर्फ विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है बल्कि भारत विविध संस्कृतियो संस्कारों और संप्रदायों के विभिन्न त्योहारों का देश भी है इसीलिए यह कहा जाता है की अनेकता में एकता भारत की पूंजी है। भारत त्योहारों का देश है जहां विभिन्न संस्कृतियां, धर्म संप्रदाय एक साथ फल फूल रहे हैं और रक्षाबंधन त्यौहार भी भाई बहन के पवित्र प्रेम का प्रतीक है। रक्षाबंधन ऐसा एक त्यौहार है जो धर्म संप्रदाय संस्कृतियों की सभी दीवारों को तोडक़र सभी त्योहारों के बीच एक अनूठा स्थान रखता है। रक्षाबंधन अपने प्रेमभाव तथा सांस्कृतिक मूल्यों के कारण देशभर में बड़े उत्साह से मनाया जाता है और हर वर्ष शुभ मुहूर्त में बहन अपने भाई की कलाई में रखी बांधकर अपनी तथा देश की सीमाओं की सुरक्षा का आश्वासन चाहती है और अपने भाई की दीर्घायु होने की कामना करते हुए बहनें इस पवित्र त्योहार को मनाती हैं।
इस श्रावण पूर्णिमा 2023 की शुरुआत 30 अगस्त की सुबह 11:27 से होकर 31 अगस्त को सुबह 7:35 तक रक्षाबंधन का त्यौहार मनाया जा सकता है। वैसे भी रक्षाबंधन त्यौहार भाई-बहन के बीच प्यार बंधन को सम्मान देने के लिए मनाया जाता है यह एक ऐसा त्यौहार है जो पूर्णिमा के दिन ही मनाया जाता है हिंदू कैलेंडर के अनुसार श्रावण मास में पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है रक्षाबंधन का त्यौहार देश के भाइयों और बहनों के बीच प्यार को बढ़ता है नियंत्रित करता है। भाई और बहन के बीच संबंध वास्तविकता में और साधारण और विलक्षण होते हैं इन्हें शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता भाई बहन का रिश्ता अतिविश्वसनीय है रक्षाबंधन एक प्रशंसनीय, सुंदर बंधन है। जिसे पूरी दुनिया में भारतवासी बड़ी सादगी सदा धूमधाम से बनाते हैं। हिंदू समाज में ऐसी अनेक प्रथाएं हैं जो सदियों से चली आ रही है उन्हें समाज आज भी मानता और यही परंपराएं हमारी संस्कृति की धरोहर भी हैं। इन प्रथाओं में कुछ-कुछ कुप्रथाएं भी शामिल थी जैसे बाल विवाह ,नरबलि, सती प्रथा जिसे समाज ने नकार कर अलग कर दिया। इसलिए रक्षाबंधन का त्यौहार एक ऐसी प्रथा है जो हम सबको परस्पर जोड़ती है इसीलिए आज भी पूर्ण हर्ष के साथ मनाते हैं स्पष्ट है कि रक्षाबंधन का यह पावन पर्व हमें रिश्तो का मन करना सिखाता है ताकि हम कमजोर वर्ग तथा देश की सीमा बाहरी आक्रमण कारियों से बचाकर रखें।
रक्षाबंधन के इतिहास में यदि एक दृष्टि डालें तो अनेक पौराणिक कथाएं भी इसकी साक्षी रही है। कई इतिहासकार इसे कृष्ण की पौराणिक कहानी के साथ इस त्यौहार के संबंध का वर्णन करते हैं कहा जाता है कि जब भगवान कृष्ण
जब पतंग उड़ाते समय धागे से उनकी कलाई भूल से कट गई थी तब द्रौपदी ने इसे देखकर साड़ी के पल्लू को चीर कर उनके रक्त से बहते हुए घाव पर बांध दी थी उनके इस इशारे को समझ कर श्री कृष्ण ने उनकी रक्षा का वचन दिया और श्री कृष्ण ने द्रोपदी की इस रक्षा के वचन को निभाया भी था। इतिहासकार इसे इतिहास से भी जोड़ते हैं मेवाड़ की रानी कर्णावती पर जब 1535 में बहादुर शाह जफर ने आक्रमण कर दिया था तब मेवाड़ की रानी कर्णावती ने अपनी राज्य की रक्षा के लिए मुगल बादशाह हुमायूं को राखी बेचकर भाई बनाकर मेवाड़ की रक्षा हेतु वचन मांगा था। मेवाड़ की रानी कर्णावती क्योंकि खुद एक बड़ी वीरांगना थी तथा बहादुर शाह का मुकाबला करने के लिए वह खुद मैदान में आ गई थी हुमायूं ने रक्षाबंधन की गरिमा को रखते हुए अपनी सेना मेवाड़ की रानी की मदद के लिए भी भेजी थी।रक्षाबंधन के संदर्भ में अनेक प्रसंग इतिहास तथा वर्तमान में प्रचलित है और वास्तव में रक्षाबंधन भाइयों तथा बहनों के बीच रक्षा तथा स्नेह के बंधन के बीच बड़ी ही पवित्रता से मनाया जाता है । रक्षाबंधन की रक्षा के लिए भाई अपनी जान की परवाह न करते हुए बहनों की रक्षा के लिए एवं देश की सीमा तथा निशक्तजनों की रक्षा के लिए कटिबंध रहते हैं। भारत भूमि में ऐसे अनेक त्यौहार भारतीय संस्कृति, सनातन धर्म की रक्षा हेतु मनाए जाते रहे हैं और मनाए जाते रहेंगे भारत की पवित्र भूमि को नमन प्रणाम।






